आल्हा छंद-वीरांगना बिलासा देवी
आल्हा छंद-वीरांगना बिलासा देवी हमन सुनें हन एक कहानी,लोकगीत गावय देवार। वीरांगना बिलासा माँ के,कथा सुनावय घूमत झार। कटकट जंगल रिहिन अबड़ के,अरपा नदिया भुँइया तीर। घूमत पहुँचय केंवट कुनबा,उहाँ बनालिन अपन कुटीर। कलकल करके गीत सुनावय,अरपा नदिया पानी संग। घूमर घूमर के नाचय वन,केंवट कुनबा घलो मतंग। हरियर हरियर डारा-पाना,कोयल कूकय कुलकै अंग। अइसे लागय कोनो योद्धा,बिन लड़ई के जीतय जंग। शुरू करत हँव एक कहानी,मातु बिलासा जेकर नाँव। परशुराम केंवट के बेटी ,जनम धरिन उन लगरा गाँव। माँ बैसाखा एकर माता,दया-मया के हीरा खान। पाय इही गुण मातु बिलासा,जीयय जिनगी संत समान। रंग रूप मा लक्ष्मी जइसे,लागय देवी के अवतार। मातु बिलासा अनपूर्णा बन,घर मा सदा भरय भंडार। रिहिन हिम्मती मातु बिलासा,जंगल जावय करय शिकार। ननपन ले उन तीर-धनुष से,अपन अंग के करय सिंगार। बरतन-भाड़ा चूल्हा-चौकी,रँधई-गढ़ई सब हा आय। अइसे जेवन रोज पकावय,झट ले मनखे चट कर जाय। गंगा कस पबरित हे अरपा,जेमा नंगत राहय धार। केंवट कुनबा मछरी मारय,डोंगा खेवय फाँदा डार। थरथर काँपे अरपा नदिया,धरे बिलासा माँ पतवार। डोंगा खेवय चाल बढ़ावय,सबो मरद मन मानय हार। एक बार...