Posts

Showing posts with the label जितेन्द्र कुमार निषाद

दोहा-कइसे बनही खाद

दोहा छंद रसायनिक हर खाद हा,खेती बर नुकसान। होवय बंजर खेत हा,बोलय गुणी सियान।। धान-पान हर साग हा,भइगे जहर समान।। छींचय मनखे खेत मा,बिखहर दवई लान।। कतको बिखहर चीज ला,खावय हर इंसान। आनी-बानी रोग ले,खोवय अपन परान।। पैरा-भूसा धान के,गरवा बर नुकसान। बिखहर दवई छींच के,मनखे लेवय जान।। कतको बड़े किसान हा,करय किसानी झार। आम पपीता जाम मा,खातू-दवई डार।। पक्का केरा आम हा,नइ हे निमगा आज। रोज रसायन डार के,बनिक बनय यमराज।। तेल फूल अउ दार मा,नइ हे अब प्रोटीन। खातू-दवई लील दिस,सबो विटामिन जीन।। बिखहर दवई खेत मा,झन डारव ग किसान। तभे रही सेहत बने,इही बात ला मान।। पालव घर मा गाय गरु,दूध-दही सब पाव। गोबर-कचरा रोज के,घुरवा मा पहुँचाव।। घर ले दुरिहा गाँव मा,घुरवा सबे बनाव। कूड़ा-कचरा डार के,जम्मों रोग भगाव।। गोबर-पैरा संग मा,घुरवा मा तैं डार। सर-गल के बनही इही,जैविक खातू सार।। घुरवा खातू खेत बर,अमरित कलश समान। राखय सदा सजीव ए,खेत-खार खलिहान।। पोषक क्षमता खेत के,जैविक खाद बढ़ाय। उपजाऊपन हा बढ़य,माटी नरम रहाय।। जैविक घुरवा खाद हा,लागत घलो बचाय। माटी बर ए खाद हा,असल मितान कहाय।। झिल्ली ले घुरवा भरे,कइसे बनही खाद। धन...

दोहा छंद-करबे कब हरि भजन

जिनगी भर मनखे परे,तोर-मोर के फेर । करबे कब गा हरि भजन,होवत अब्बड़ बेर।। मोह-मया मा सब फँसे,कोन करय हरि ध्यान। समय मिले मा जप करय,संत उही ला मान।। धन-दोगानी बर पड़े,काबर हर इंसान। राम नाम धन सार हे,राम नाम धन जान।। मया करव सब राम ले,राम नाम हे सार। बिना राम के हे कहाँ,जिनगी के आधार।। राम हरे नाविक बड़े,नाम जपे ले आय। भवसागर के धाम ले,बेड़ा पार लगाय।। राम नाम के मंत्र ला,कर लव मन से जाप। धोवा जाही तब हमर,जिनगी के हर पाप।। जितेन्द्र कुमार निषाद

दोहा छंद-दाई बाबू

दाई बाबू संग मा,बड़का ये भगवान । कर ले सेवा रोज के,तर जाबे इंसान ।।

दोहा छंद

बंदौ मइया सरसती,चरण कमल मा तोर । अँधयारी मन खोर मा,कर दे ग्यान अँजोर ।।

दोहा छंद

एती ओती झन करव, खोर म कचरा ढेर । कूड़ादान म डार के, मच्छर ले मुँह फेर ।। माढ़े पानी मा सदा,डेंगू मच्छर होय । करन सफाई अब हमन,आवव मिल सब कोय  ।।     

दोहा छंद-कपाट

दुख के काँटा मा भरे,जिनगी के हर बाट । बंद परे हे मोर गा,सुख के भाग कपाट ।। अँधियारी चारो मुड़ा,अउ नइ दिखे कपाट । लकर-धकर मा गिर जबे,जाही फूट ललाट ।।

दोहा छंद-ओंकारेश्वर धाम

दरसन कर शिवलिंग के,ओंकारेश्वर धाम । बन के भँवरा जाप कर,तैं हर शिव के नाम ।। आज महाशिवरात हे,बम बम बंदे बोल । मन के बिख ला शिव हरे,तब हे तन के मोल ।। आज महाशिवरात के,चढ़े भक्ति के रंग । दरसन भोलेनाथ के,जुरमिल करबो संग ।।

दोहा छंद-फागुन

नाचे डंडा नाच जब,फागुन  आवै  याद । गावै मनखे डाँहकी, फाग गीत  के बाद ।।1 फागुन पुन्नी तीर हे,गावव होली गीत। भाईचारा रंग मा,रंगे बैरी मीत ।।2 बड़े बिहनिया गाँव मा,छेना धरके जाय । राख अंग मा बोथ के,मनखे घर मा आय ।।3 काम वासना लेस के,होली सफल  बनाव। मया प्रीत के रंग ला,सबला घोर लगाव।।4 रांधे फागुन मा कहे,चइत फेर सब खाय । कहिथे सकल सियान मन,बात सहीं का पाय ।।5 जितेन्द्र निषाद

दोहा छंद-जोते खेत किसान

नाँगर बइला फाँद के,जोंतय खेत किसान । खून पसीना छींच के,उपजावय उन धान ।। संझा बिहना रोज के,जावय खेत किसान । सेवा धरती के करे,दाई बाबू मान ।।

दोहा छंद

बहिनी भाईदूज के,बाँधे रक्षा ताग । भाई ले आसीस बर,रइथे सुग्घर पाग ।।

दोहा छंद

होथे नारी सरसती,विद्या देवय रोज । गुरुकुल मा चेला करे,नवा ग्यान के खोज ।।

दोहा छंद-तीजा तिहार

तीजा परब तिहार मा,बहिनी मइके आय । पबरित भादो मास मा,सुग्घर तीज मनाय ।। चउथ बिराजे गजवदन,रिषी पंचमी आय । बइगा मन के ये परब,जड़ी-बुटी बड़ खाय ।। 

दोहा छंद

बाजा गाजा संग मा,भोला जाय बरात । लाड़ू मोतीचूर के,उसर कुसर के खात ।।

दोहा छंद

महतारी भाखा हमर,छत्तीसगढ़ी जान । दाई बाबू संग मा,हमरो इही जुबान ।।

दोहा छंद

चाहत हँव मैं एक दिन,करँव अंग ला दान । आवय पूरा काम गा,तन के सब सामान ।।

दोहा छंद-अपन परिचय

मोर नाँव जीतेन्द्र हे,रथँव सांगली गाँव । ददा जगेशर राम हे,माँ के चम्पा नाँव ।।1 दू झन लइका मोर गा,दूनो टूरा ताय । अब्बड़ हे अतलंगहा,तब्भो जिया लुभाय ।।2 तरिया नरवा तीर मा,खेत खार घर द्वार । बोथँव भाजी चेंच गा,बेचँव कँवर बजार ।।3 बनी भूति करथँव कभू,गाँव शहर मा खोज  । तब्भे मिलथे पेट भर,पानी पसिया रोज ।।4 दोहा रोला छंद मा,रचथँव रचना रोज । करथँव हिरदै भीतरी,नवा ग्यान के खोज ।।5

कुण्डलिया छंद

                   कुण्डलिया छंद दोसी हावय कोन अब,जलके होगे खाख । कतको लइका आज गा,कोचिंग मा नइ साख ।। कोचिंग मा नइ साख,मौत के बनगे सेंटर, जरके मरिस अतेक,रहीगे देखत मेंटर । खो दिस बेटा फेर,अकेल्ला होगे मोसी, गिरगे दुख के गाज,कोन हे एकर दोसी ।

कुण्डलिया छंद

                   कुण्डलिया छंद लइका मोर जवान हे,पढ़-लिख के बेकार । करे नहीं कुछु काम अब,घूमै खारे-खार ।। घूमै खारे-खार,लगाके चश्मा टोपी । बनके रसिया रोज,अपन बर खोजे गोपी । नइ माने कुछु बात,लात मा मारे फइका । संगी साथी संग,मंदहा बनगे लइका ।।

कुण्डलिया छंद

                  कुण्डलिया छंद सत के रद्दा मा चलव,झूठ लबारी छोड़ । परमारथ के काम ले,संगी नाता जोड़ ।। संगी नाता जोड़,त्याग के अपन सुवारथ, धीरज धरम समेत,होय झन पाप अकारथ । जीतेन्दर के मान,रही मानवता जतके, दया-मया बरसात,होय रद्दा मा सत के ।

कुण्डलिया छंद

           कुण्डलिया छंद छींचे मनखे खेत मा,अब्बड़ डीपी खाद । जैविक खेती छोड़ के,करे भूल आबाद ।। करे भूल आबाद,लोभ मा पइसा सेती, दवई दारू छींच,करे महुरा के खेती । मरगे मनखे आज,रोग मा गड़गे नीचे, धरती दाई रोय,खेत मा काबर छींचे ।