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ज्ञान के आँगन का सवाल

*ज्ञान के आँगन का सवाल* जब-जब फंदे पर मिले शव, आवासीय विद्यालय में, तब कौन दोषी है, किसे सजा मिलेगी न्यायालय में? अब बार-बार घट रही घटनाएँ, ज्ञान के आँगन में, कौन सुध लेगा, जब चिराग बुझ रहे सावन में? वार्डन की निगरानी पर अब तो करना पड़ेगा सवाल, गुरु-शिष्य के बीच के रिश्ते का जानना होगा हाल। बच्चों के बीच दोस्ती-दुश्मनी का रखना होगा हिसाब, शासन-प्रशासन को देना होगा हर पालक को जवाब। क्या बच्चों की अनबन से ही शुरू होती है वो जंग? शायद वही बन जाता है, खुदकुशी का एक रंग। अवसाद हो, पढ़ाई का दबाव हो या कोई बाहरी लगाव, कारण कुछ भी हो, मूल में है निगरानी का अभाव। जीतेन्द्र निषाद'चितेश

हे गणपति महराज

हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जब गाँव-गली खोर म ठाड़े हे,कतको झन बनके दुःशासन अउ रावण। अरे!घर म सग्गे भाई-बाप घलो करै शोषण,अब कइसे होगे मनखेमन? तब घर-बन के बैरी ले कोन बचाही हम ला आज? हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। बिक्कट होवत हे दुराचार अबला समझ के,नारी अउ अबोध लड़की सन। जेन नइ देखे राहय जिनगी के एको बसंत,तेकर बर मरद बनै जबरन। दुराचारी मरद के शिकार बर तोला बने ल परही बाज। हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जेन पशु बरोबर करै बेवहार,भाग मढ़ा दे वोकर गरदन काट के। जेन लबारी के दलील दे अदालत म हवसी बर मार चूंदी हपाट के। अइसन कानून बने तभ्भे नियाव पाही तिरिया समाज। हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

मटकी ल फोड़

मटकी ल फोड़,पइसा बटोर,सुन ले संगी मोर। कोशिश कर ले आके तहूँ ,एक घाँव जी तोड़ । डोकरी घलो हवय रेस म,डोकरा घलो हवय टेस म। आँखी म बाँध मया के पट्टी,अरे! मया के बंधना ल छोड़। जिनगी का हे?सुख-दुख के मेला,ये तन का हे? माटी के ढेला। ये जग ल छोड़ तैं जाबे अकेला,अब हरि ले नाता जोड़। सबले बड़का ऊपरवाला खिलाड़ी,बाकी जम्मो झन हवय अनाड़ी। करम के लाठी तोर हाथ म,सत के रद्दा ले कभू  मुँहू झन मोड़। कइसन मटकी ल तैहा फोड़बे,कइसन पइसा ल तैहा बटोरबे? गरब के मटकी ल तैहा फोड़,हरिनाम के पइसा ल तैहा बटोर। मटकी ल फोड़,पइसा बटोर,सुन  ले संगी मोर। कोशिश कर ले आके तहूँ ,एक घाँव जी तोड़। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

सारी के बिहाव म

सारी के बिहाव म भांटो नाचै अकेल्ला अकेल्ला। सजनी बिन सारी प्यारी,भागै दुम दबाके पल्ला। आके सारी मोर संग नाच लव,कनिहा जोरी जोरी। साढ़हू घलो संग म हावय,मजा आही थोरी थोरी। सास के बाद डेड़ सास हे,यहू नत्ता खासमखास हे। बड़का साढ़हू,बड़का भइया,लागै अभी तीजा उपास हे। सास लागै महतारी बरोबर फेर देथे अब्बड़ गारी। छितका कुरिया के तोर बेटी लागै सौंहत राजकुमारी। गंजहा नइ हँव,मंदहा नइ हँव,हांँवव मैं बेलबेलहा। फेर बारी-बखरी बुता करथँव,नइ राहंँव मैं ठेलहा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

नेतामन भगवान

कलजुग म नेता मन भगवान होगे जी। हरेक मंच म उही मन बिराजमान होगे जी। राजनीति म जे लफरहा खिलाड़ी। पावै बड़ मान,होवै ओकर पुछारी। गाँव-शहर म पुजारी मन बलावैं धरम के मंच म धर्मात्मा बन जावै। फेर दया धरम बिन लफरहा मन, काबर महात्मा सही महान होगे जी? कलजुग म नेता मन भगवान होगे जी। बने मनखे के गोठ म ताली नइ बाजै। राजनेता के लबारी म परजा ह नाचै। गिरगिट घलो शरमा जाय रंग बदले म। राजनेता नइ शरमाय घोषणा के चाल चले म। फेर घोषणा पूरा करै बिन हर जघा, लबरा मन के काबर सम्मान होगे जी? कलजुग म नेता मन भगवान होगे जी। जब पधारै कोनो कार्यक्रम के ठीहा म। तब माई पहुना बन,दिन रहै या रतिहा म। सामाजिक-धार्मिक मंच म अंधभगत बनके। पूजा करै,पढ़-लिख के हुसियार मन नेता मन के। फेर हुसियार मन के नजर म माई पहुना बर, गाँव-घर के बने मनखे मन काबर शैतान होगे जी? कलजुग म नेता मन भगवान होगे जी। हरेक मंच म उही मन बिराजमान होगे जी। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

सेल्फी के धुन

सेल्फी के धुन म,सून होगे पुन। निकलै दिखावा म दिन छुन छुन। नेकी कर सोशल मीडिया म डाल। बता अपन करनी के जम्मो हाल। इही चरित्तर हे लोभ के देश-दुनिया म। काम कोन करे नि:सुवारथ के गुनिया म? अपन चोला तरी धीरे धीरे गुन। सेल्फी के धुन म,सून होगे पुन। जेवनी हाथ के करनी,डेरी हाथ झन जाने। अइसन हो करनी,ऊपरवाला तोला माने। करके भलाई,कलेचुप,घर निकल भाई। मनखे करे चाहै तोर बुराई या बड़ाई। बिना शोर,हिरदै के गोठ सुन। सेल्फी के धुन म,सून होगे पुन। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

पंचायत चुनाव

अब आवत हे चुनाव मीठलबरा मन ईमानदारी से करही लगाव। हितवा बनके,भोकवा समझके,जनता के करही भारी भरिहाव। विकास के गंगा बहा दीही हितैषी मन गोठे-गोठ म।असल के धरातल म विकास ल देखके पड़ जाबे सोच म। करही भारी वादा मुखिया बने बर जुबान के राशनकार्ड म। नपा लव नाली-कलामंच बनाय बर अपन गली,अपन वार्ड म। मुखिया बने के बाद असल खेला होही ऑडिटर के दफ्तर म। धरसा ह रद्दा बन जाही बिना मुरुम के कमीशन के डम्फर म। गली ह नाली बन जाही,बोहाही घर के मुंँहाटी म निरमल धारा। सारा-भांँटो के गारी ले कम नइ होय पारा म भाईचारा। अब परजा घलो फोकट के खाय बर सरबस टकरहा होगे। प्रत्याशी नंगत खर्च करथे सुवारथ म पद बर हफरहा होगे। जे लगाही अपन कमाई के असल ल राजनीति के फसल म। वसलूही चार सौ बीसी करके ईमानदारी से अपन अकल म। ग्राम सभा म गाँव के बुनियादी सुविधा के बारे म बिना खोट के। मुखिया ल उही बोल सकथे जे वोट करे रही बिना नोट के। मानवता,ईमानदारी नइ मिलय कलजुगी मनखे के तरी घट म। कइसे विकास के गंगा बोहाही संगी गांव-गली अवघट म। निःसुवारथ काम करही गाँव के जे मुखिया तभ्भे नवा इतिहास गढ़ही। परजा घलो बिना लोभ के वोट दीही सोच-समझके तभ्भे गाँव तर...

गुरुजी बनके

का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। सरकार के गलती गाल म तमाचा सहीं लागे। अउ हाई कोर्ट के आदेश छाती म खंजर दागे। चेला से छुटगे गुरुजी के नाता क्षण भर म झट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? गुजरगे महीना कई बिन पद के तूता धरनास्थल म। डबल इंजन सरकार नइ करिन समायोजन अपन बल म। दुलरवा दरोगा ले डंडा के अंडा खवा दिन बिन कहे फट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? दण्डाशरण पँइयाँ लागेंव बीच बजार म अउ का करँव? अपमान ल मान समझेंव बीच बजार म अउ का करँव? ज्ञान के दाता ल भिखमंगा बना डरिन भिखमंगा मन हुकूमत ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? आज नइते काली कोनो मोरो सुध लिही इही आस म। फेर चलत हवय सुंँवासा सरकारी मरघट के पास म। जीयत हँव गुरुजी के पद बर,अपन हक बर,अपन हठ ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

नकटा के नाक कटाय

नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जब चोरहा मनखे मन नियाव के सिंहासन म बिराजैं। करे निरपराधी के फैसला,जे मेहनत के पागा बाँधैं। चोरी करे सहीं,काकरो बहू-बेटी ल छेड़े सहीं, अपराधी बनाके गाँव-समाज ले छोड़े के हुकुम सुनाय। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। चोर के दाढ़ी म तिनका,ये कहावत सही जनाय। कोनो आन जात के बेटी ल खुदे उड़हरिया भगाय। अउ काकरो बेटी आन जात घर खुदे उड़हरिया जाय। नाक ल ऊँचा करके,सिधवा ल दंड के भागी बतायँ। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। नकटा मन कुटेलहा परे अउ नाक सवा हाथ बाढ़े। बने मनखे के बीच बाजार,इज्जत के पैजामा उतारे। कोनो कंगला ल सता के ये मन फोकट म देवय राय। खुद के घर के गाथा ये मन ल काबर याद नइ आयँ? नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलाय। अमरित बचइया मन,नशेड़ी मन बर आरती सजायँ। सट्टा लिखइया-जुआ खेलइया मन बिक्कट बढ़ावा पाय। कोन उँकर हाथ बाँधैं हे,काबर आवाज नइ उठायँ। बिन पाती,बीच बजार ये मन ल काबर नइ बलायँ नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जीतेंद्र निषाद'चितेश'

माया के बजार

माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जिनगी भर करे'संगी'मोर मोर मोर, बात थोरिक गुन ले,इहाँ नहीं कोनो तोर। लोभ म मोहाके,अपजस धन कमाएस, जनसेवा बिसराके,हरि सेवा गँवाएस। पर ल पीरा देके तोर चोला कइसे तरही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। जवानी म बूड़े'संगी'सुवारथ मया म। जीयत भर नइ जानेस दया धरम करे ल। मन मंदिर म कभू दीया नइ जलाएस? हरिनाम के कंठ ले कभू जस नइ गाएस? हरि भजन बिन तोला मुक्ति कइसे मिलही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। गोविंद ल पाए बर गुरु के सुमरनी। करे ल परही सुधार अपन करनी। जिनगी के बेड़ा घलो पार लगही। अंत समय जे हरि के सुध करही। उही जनम-मरण के फेर ले उबरही। माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

सदगुरू मिलिस नाही

सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। नित हरि गुण गावय,काम करय रसिक राजा के। कलजुग के गुरु भक्ति बिन,सदगुरु बनय परजा के। पाँव परय असल चेला बिछल के गुरु दरबार मा। सदगुरु मिलिस  नाही,कलजुग के मायाबजार मा। चेला का करय,उहू भरम मा परय। गुरु के अलकर करनी नजरबंद रहय। कइसे होही बेड़ापार,जिनगी मझधार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। घर मा दाई-ददा अउ भाई-बहिनी, लइका-सियान के गजब कहिनी। देखय अउ सुनय बर मिलय,ये संसार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। संग मा रत्नावली सहीं,जब मिल जावय गुरु। तुलसीदास सहीं चेला,पावय पाठ-पीड़हा शुरु। तब गुरुमंत्र मा तरही मनखे,घर-दुआर,परिवार मा सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

होवइया बहुरिया चलय ससुरार

होवइया बहुरिया चलय ससुरार गजब के आ गेहे अब नवा दिन,होवइया बहुरिया चलय ससुरार। दाई-ददा के संग,भाई-भौजी के संग,मयारू के नगरिया म पहिली बार। बिन बिहाव के,फलदान के पहिली। का बने,का गिनहा,देखे बर पगली। कलजुग के नवा रीत निभाय बर,मयारू के दुवरिया म पहिली बार। होवइया बहुरिया चलय ससुरार,होवइया बहुरिया चलय ससुरार। का धुरपइयांँ पाँव मा बिहाव होके आबे? बिहाव के पहिली,धुर्रा उड़ाके मइके जाबे। केदे हाथ मा हाँथा देबे,केदे भिथिया?मयारू के  कुरिया म पहिली बार। होवइया बहुरिया चलय ससुरार,होवइया बहुरिया चलय ससुरार। अब कलजुग के पहावत बेरा मा,ये रीत घलो ठीक हे। फेर जुन्ना सियान मन कइथे,ये संस्कार खीक हे। समय के संग चलव अउ जिनगी जी लव,मयारू के दुनिया म पहिली बार। होवइया बहुरिया चलय ससुरार,होवइया बहुरिया चलय ससुरार। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद  

होली हे

होली हे होली हे होली हे होली हे, होली हे होली हे होली हे। जिहाँ दया के चिन्हा अउ मया के बोली हे, होली हे होली हे होली हे..... कलजुग मा उराठिल मनखे के भाषा, पइसावाला बोलय पइसा के भाषा। गाँव-शहर मा नइ दिखय कान्हा के बासा, जिहाँ पियास बुझावय सुदामा सहीं पियासा। कलजुग मा कान्हा के,सुदामा कहाँ हमजोली हे। होली हे होली हे होली हे..... सुनता के सरु गाय घरोघर खोरी। नान्हें करय बड़का से मुँहजोरी। परिवार मा नइहे बेटा-बहू संस्कारी। निष्काम प्रेम के जे मारय पिचकारी। कलजुग मा सीता-राम सहीं बहू-बेटा के कहाँ जोड़ी हे।  होली हे होली हे होली हे..... कलजुग मा नइहे करण सहीं एक्कोझन दानी। महर्षि दधीचि के हाड़ा सुनावय बलिदान के कहानी। अब दान-धरम के रंग मा होली खेलय,कलजुग के महादानी। सोशल मीडिया मा फोटू भेजय,दिखावा के चढ़य छानी। परमारथ के करमभूमि मा नि:स्वारथ के कहाँ डोली हे। होली हे होली हे होली हे..... जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद