माया के बजार
माया के बाजार ल,तज के जाना परही।
नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही।
जिनगी भर करे'संगी'मोर मोर मोर,
बात थोरिक गुन ले,इहाँ नहीं कोनो तोर।
लोभ म मोहाके,अपजस धन कमाएस,
जनसेवा बिसराके,हरि सेवा गँवाएस।
पर ल पीरा देके तोर चोला कइसे तरही?
माया के बाजार ल,तज के जाना परही।
जवानी म बूड़े'संगी'सुवारथ मया म।
जीयत भर नइ जानेस दया धरम करे ल।
मन मंदिर म कभू दीया नइ जलाएस?
हरिनाम के कंठ ले कभू जस नइ गाएस?
हरि भजन बिन तोला मुक्ति कइसे मिलही?
माया के बाजार ल,तज के जाना परही।
गोविंद ल पाए बर गुरु के सुमरनी।
करे ल परही सुधार अपन करनी।
जिनगी के बेड़ा घलो पार लगही।
अंत समय जे हरि के सुध करही।
उही जनम-मरण के फेर ले उबरही।
माया के बाजार ल,तज के जाना परही।
नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही।
जीतेन्द्र निषाद'चितेश'
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