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सम्मान

विषय-- *सम्मान* हरिगीतिका छंद  सम्मान खातिर आदमी करथे उदिम सरलग अबड़। अवसर मुताबिक तन जथे सकला जथे जइसे रबड़। । सम्मान हा सिर मा चघय कतकोन के बनके नशा।  सम्मान के लालच बिगाड़य आदमी मन के दशा। । सम्मान के भूखा सबो रहिथे जगत के रीत जी।  कतको सुनावय मान खातिर चापलूसी गीत जी।। गदहा ल बोलय बाप रगड़य नाक कतको द्वार मा। बस मान जइसे भी मिलय थोड़ा-बहुत संसार मा।। लेकिन यहू सच ए टिकय नइ कभू झूठा मान हा। नइ मिलय फोकट मा कभू कोनो ल  सत सम्मान हा।। सम्मान ला कोनो बिसाये नइ सकय बाजार ले।  सम्मान मिलथे आदमी ला काम ले व्यवहार ले। ।🙏 दीपक निषाद--लाटा (भिंभौरी)-बेमेतरा

भक्ति दोहा

राम राम के बेर मा,झन कर कउँआ काँव। जप ले जोही नाँव हरि,जिभिया ले हर घाँव।।

शराब

होगा किडनी-लीवर,एक दिन खराब जी। पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? हमें क्या है करना,ये तुम्हारी है मर्जी। यमराज के द्वार,स्वयं दे रहे हो अर्जी। बीवी-बच्चे भूखे,तुम बने हो नवाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? तुम हो बड़े ज्ञानी,बात किसकी मानी। दूध-दही-घी तुम्हें,लगे विष की रानी। दारू पीकर लगते हो,संत जनाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? तुम्हें मान सदा मिला,अपने समाज में। मस्त रहे तुम,अपने रीति-रिवाज में। जग से जाने के बाद,करना हिसाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद