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मेरी प्यारी भांजी

मेरी प्यारी भांजी,अपने मामा के घर आइए। अपनी मधुर मुस्कान से मामी को लुभाइए। मामा तेरा कंजूस,मामी तेरी पिलाएगी जूस। यह जानकर मेरी भांजी,हो गयी बड़ी खुश। नाना तुम्हारा सब्जी बेच समोसा लानेवाला। रेणु भांजी के संग,चैतन्य,गावस्कर खानेवाला। नानी तुम्हारी चुलबुल मस्ती देख बुदबुदाती। मामी तुम्हारी अपनी बातों से शांत कराती। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

हमर सरपंच

हमर सरपंच अब गंजहा-मंदहा होगे जी। का करबे होशियार रहिके गदहा होगे जी। चुनाव जीतत ले बने,बने के करिस प्रपंच। जीते के बाद बना दिस मंदहा बर रंगमंच। खरा सोना मनखे,संगत म लोहा बरोबर, गाँव के विकास बर भारी जंगहा होगे जी। हमर सरपंच अब गंजहा-मंदहा होगे जी। इसने म कइसे होही तरक्की चारों कोती? सड़क,नाली-पुल के संग नइये गाँव म जोती। सरकारी दाहरा म,सरकारी मोती बर विभाग म, भागमभाग के डुबकी लगइया अपंगहा होगे जी। हमर सरपंच अब गंजहा-मंदहा होगे जी। अतका दिन होगे गाँव म नइ हे ओपन जिम। सोलर लाइट के बिना चँउक लागै सिम सिम। अरे! नान्हे-नान्हे गाँव म अइसे का करिन ? ये सुविधा पाँच साल पहिली सँझकेरहा होगे जी। हमर सरपंच अब गंजहा-मंदहा होगे जी। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

सुघ्घर सांगली

हमर सांगली,सुघ्घर सांगली। मया मिलै जिहाँ गली-गली। दाई-दीदी अउ भाई-बहिनी के। पबरित नत्ता बर जगजननी के। फेर मानवता के पाठ काबर भूल चली? हमर सांगली,सुघ्घर सांगली। मसीहा के रूप म नान्हे उमर म। जस करइया सदा मिलय हर घर म। इह आशा-विश्वास ले रखै मरजाद ल। इरखा-द्वेष बिन सदा सुनै फरियाद ल। फेर नियाव करइया मन झन होवय नकली। हमर सांगली,सुघ्घर सांगली। खपचलहा नइ मिलै,दोगला नइ मिलै। बखत परे म शकुनी चाल,नइ चलै। अमृत के नाँव म फंदा नइ डारै पर के गर म। सरबस भलमानस मिलै हर ठउर म। फेर मदद ल बिसारके,झन खाँचा खनै असली। हमर सांगली,सुघ्घर सांगली। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

माँग पत्र

मोर गाँव बर माँग पत्र, कविता के जरिया ले। हमर छत्तीसगढ़ के आदरणीय मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय। बालोद जिला के जम्मो केंवट मन ह बड़ आदर से हें बलाय। गाँव भिलाई म झूमर-झूमर के भौंरा स्वागत गीत सुनाय। राम बरोबर विष्णुदेव साय,केंवट कुनबा म आज तो आय। दरसन करत हें शबरी बरोबर केंवट कुनबा के जम्मो दास-दासी। मया के जूठा बोइर खाइन वनवासी,तरगिन गाँव भिलाईवासी। मोर नाँव जीतेन्द्र,मुख्यमंत्री जी,सांगली गाँव बर अपन मया बरसाव। केंवट समाज के भवन बर,दस लाख के घोषणा कर दव एक घांँव।। कोनो नेता,अभिनेता,समाज सेवक मोर अरजी मुख्यमंत्री सो पहुँचाव। अउ स्वीकृति करा के,ये चारण के मुख ले जिनगी भर वाहवाही पाव। इही अरजी हे ये सेवक के सुन लव मोर गोहार। किरपा होही तुंँहर,कर लव मोर अरजी स्वीकार। जीतेन्द्र निषाद"चितेश" ग्राम-सांगली,पोस्ट-पलारी तह.-गुरुर,जिला-बालोद(छ. ग.)

हरेली तिहार

हरेली तिहार फाँदै जांँगर बइला ला,खेत सही घानी मा। अन्न बरोबर तेल निकलै,झोंकै जग पेट थारी मा। श्रम के चीला चढ़ावै,देवता मान खेती के औजार ला। दास बरोबर किसनहा मन,जिनगी के हरेली तिहार मा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दामाखेड़ा जाबो

दामाखेड़ा के मेला जाबो दामाखेड़ा के मेला जाबो न, दामाखेड़ा के मेला जाबो न। गुरु चरण के,चरण अमिरत पाबो न, दामाखेड़ा के मेला जाबो न। जिनगी पहावत हे तोर-मोर म, कर लेबो गुरु सुमिरन उही ठउर म। सदगुरु'कबीर' के,गुन गाबो न दामाखेड़ा के मेला जाबो न। जनसेवा ले तैं पुन कमाले, इही काम म,तैं  मन लगाले। गुरु के देवल सत्यनाम ,नइ भुलाबो न, दामाखेड़ा के मेला जाबो न। मद-मोह के मायाजाल ले, मुक्ति मिलही तैं जान ले। ये जग के मेला ठेला,अउ नइ आबो न, दामाखेड़ा के मेला जाबो न। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद  

पताल चटनी

पताल चटनी पताल चटनी,कइसे खाबो सजनी। सरग ले पाताल होगे एकर मँगनी। सिट्ठा होगे चटनी,धनिया-मिर्चा के जुगाड़ मा। नून बर पइसा नइ मिलै,पइसा के झाड़ मा। नंगत के झुलसावै,महँगाई अगनी। पताल चटनी,कइसे खाबो सजनी। कंँगला मनखे मन ला,नून-तेल अउ दार। जी एस टी के मारे पंसारी,नइ देवय उधार। घर मा राशन नइहे,जुच्छा खोली रंधनी। पताल चटनी,कइसे खाबो सजनी। सिलेंडर होगे तीन सौ ले रुपिया हजार। गाड़ी मा लानँव कइसे,पेट्रोल सौ रुपिया पार। घर के हालत पंचर,नइहे जेब मा चवन्नी। पताल चटनी,कइसे खाबो सजनी। बारो महीना रोजगार,गाँव कोती सरकार। जम्मो झन ला दिही,रुपिया आही भरमार। जांँगर टोर कमाबो,नींद आही रजनी। पताल चटनी,संघरा खाबो सजनी। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

सरसी छंद

सरसी छंद-गुरु सदगुरु बिन नइ मिलै ज्ञान हा,कइथें वेद पुरान। फेर कार कलजुग मा गुरु मन,बनत हवयँ शैतान। कोनो जग मा बापू बनके,कोनो भैयाराम। करत हवयँ गुरु सदगुरु बनके,फकत नाँव बदनाम। स्वार्थी गुरु संगत ले होही,कइसे बेड़ापार। चिटिको गुनव मोर हाँका ला,रोज्जे तीन जुवार। हमरो भीतर घलो समाहे,राग-द्वेष अभिमान। इंँकर संग मा रहिके गुरु के,कइसे करन बखान। मानवता के गुण मनखे मा,जे गुरु भरय अपार। वो गुरु ला बइहा चेला हा,खोजै बारंबार। आदिकाल के गुरुकुल गुरु मन,मन बइला ला फाँस। नेकी नंगत करय जगत मा,जस बगरै आकास। कलजुग के खपचलहा गुरु मन,इंद्रिय कसैं लगाम। तभ्भे अमर रही जग मा गुरु,अउ सदगुरु के  नाम। बने करम ले जीव-जगत के,करही गुरु उद्धार। गुरु के महिमा मनखे गावत,करही जय-जयकार। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दोहा-रक्तदान

दोहे  रक्तदान के काम मा,सरलग कर सहयोग। अपन लहू ला दान कर,परमारथ सुख भोग।। रक्तदान के अहमियत,एक सिखावै पाठ। पर के जिनगी नित बचा,झन कर हिरदै काठ।। जगही जब संवेदना,पर के दुख ला देख। मानवता तभ्भे रही,मनखे तरी सरेख।। मानवता के गुण बिना,रक्तदान नइ होय। कतको मनखे प्राण ला,बिपत परे मा खोय।। धर सकथे विपदा कभू,दुर्घटना कस रूप। प्रसवकाल के संग मा,रक्तस्त्राव कस कूप।। हीमोफिलिया संग मा,ल्यूकिमिया के रोग। अइसन रोगी ला लगै,सदा लहू के भोग।। सदा जरूरतमंद बर,अपन लहू ला देव। इसन रक्तदाता सदा,अघुवा रह स्वयमेव।। जीयत भर देके लहू,अपन कमा ले साख। फेर मरे के बाद तैं,होबे संगी राख।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

बरवै छंद-चिरहा चीर

बरवै छंद-चिरहा चीर हमर गाँव के तरिया,रद्दा तीर। मैं देखेंव एक झन,खड़े फकीर। ओकर तन मा आरुग,चिरहा चीर। ओला देख मोर मन,होय अधीर। जग मा कइसे जीयत,हे इंसान। मनखे कोती दे प्रभु ,चिटिक धियान। मोर स्वप्न मा कइथे,हरि भगवान। तैंहा लइका जइसे,निचट नदान। हरे पश्चिमी फैशन,ए परिधान। मोला दोष अतिक झन,दे इंसान। अतिक समझ नइ पाइस,तोर जमीर। लगै असल बड़हर हा,असल फकीर। पहिरत हावय कपड़ा,बाँध जँजीर। टूरा मेछराय बस,टूरी तीर। चिरहा चीर पहिर के,मारय टेस। नव फैशन नइ जानस,टार 'चितेश'। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दोहा जपले जोही

सादर समीक्षा हेतु दोहा छंद-जप जोही हरि नाँव ला राम राम के बेर मा,झन कर कउँआ काँव। जप जोही हरि नाँव ला,जिभिया ले हर घाँव।। कल्लर कइयाँ ले कभू,मिलै नहीं सुख-चैन। अंतस मा होथे दरद,दिन लागै ना रैन।। गोठ सियानी प्रेम के,मूर्ख समझ नइ पाय। कीलिर कालर होय ले,घर हा नरक जनाय।। सहनशीलता अउ सुमति,दू ठन हवय उपाय। जेकर ले परिवार मा,सुख सम्मत नित छाय।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दोहा-हाट बजार

दोहा छंद-हाट बजार जग के माया हाट मा,छै ठन हवय विकार। काम-क्रोध अउ द्वेष सँग,लोभ-मोह अहँकार।।   छै विकार से जेन हा,खुद ले पाही पार। जग के माया हाट मा,ओकर जय-जयकार।। शक्ति शांति गंभीरता,पवित्रता अउ प्यार। ज्ञान खुशी ये सात गुण,पा सत्संग बजार।। असल सात सद्गुण जिनिस,बिकट बिसा तैं रोज। खुद के हिरदै भीतरी,अइसन पसरा खोज।। मिलही माया हाट मा,सरग बरोबर छाँव। जपबे हरि के नाँव ला,घड़ी-घड़ी हर ठाँव।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

सार छंद-होली

सार छंद-होली लाली-लाली परसा फुलवा,जब लागै मनभावन। तोर बिना तब सुन्ना सजनी,मोर हिया के आँगन।1 कोन संग मा रहिके हितवा,हावय कोन मयारू? बोलय होली मा जिवरा हा,सुन गा कका समारू।2 मनखे मतलबिहा कलजुग मा,होगे हावय अतका। छुरा पीठ मा गोभे संगी,जम के मारय मुटका।3 दान धरम पुन असल रंग ए,महिमा ऋषि मुनि गावैं।  पर औगुन के रंग चढ़े ले,असली रंग नँदावैं। ।4                                        दीपक निषाद लाटा बेमेतरा कइसे खेलँव मैंहा होली,खुशी-खुशी हमजोली। मनखे के हिरदै मा नइ हे,दया-मया के खोली।5 दया-मया अउ सेवा सटका,इही मोर बर सजनी। मोर हिया के आँगन मा नइ,अब ये जीवनसँगिनी।6 दया-मया सेवा सजनी बन,जभ्भे दिल म समाही। दान धरम के असल रंग ले,मजा फाग के आही।7                                        दीपक निषाद,लाटा,बेमेतरा जीतेंद्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद  🙏🙏

दोहा बोरे बासी

दोहा छंद बोरे बासी गोंदली,अउ खेड़ा के साग। कतको झन के भाग ले,काबर जाथे भाग।। मनखे मन समझैं नहीं,मनखे के जज्बात। एकर से जादा नहीं,जग मा दुख के बात।। कभू कभू देदे करव,लाँघन मन ला भात। अइसन पुन के काज ला,जानौ मनखे जात।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'