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पल्ला दाई घर झन जाए कर

गोरी मोला अब्बड़ सताथस, फेर मया घलो अब्बड़ जताथस। रीस म कहिबे,कुछु तोला त, पल्ला दाई घर काबर जाथस? सजना के बोली नइ सुहावै, सास-ससुर मोला नइ भावै। ननंद के करनी आगी लागै, देरानी-जेठानी गोली दागै। पल्ला दाई घर मैंहा जाथँव, फेर सजना के मान गँवाथँव। पल्ला दाई घर झन जाए कर, घर-समाज म मान पाए बर। बोली ले झन बाण मारे कर, रीस के आगी झन बारे कर। सजना के हिरदे मा गोरी मया के नवा जोत जगा दे कर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

मोर नोनी

छुनुक-छुनुक पैरी बाजे तोर नोनी। पाँव मा सुघ्घर साजे मोर नोनी। कका किंजारे सौंहे-सौंहे तोला, रोज अटल चऊँक ह बाट जोहे तोला। किलकारी तोर जोश भरे मन मा, जीवन अमृत लागे एक क्षण मा। अइसे हे मधुर मुस्कान तोर, दुखी मन सुखी हो जाथे मोर। अटल चऊँक के अंगना गमकत हे, नोनी के रूप फूल जइसे लवकत हे। भौंरा बतावै गाँव भर मा घूम-घूम के, कोयली कूके बाग मा झूम-झूम के। सुनके गुरतुर बोली तोर नोनी, चिरई चहके,मैं भाव-विभोर नोनी। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

हरेली तिहार

विषय-हरेली हरे हरेली पहिली,हमर तिहार। करय किसनहा मन हा,जय जोहार।। खेती संग मितानी,घर-संसार। रोजी-रोटी देवय,खेत हमार।। करय किसनहा खेती,बिन आराम। बढ़त हवय खातू के,नंगत दाम।। लादन देवय एसो,दुकानदार। हर दुकान के होगे,नाटक झार।। ट्रेक्टर ले जोताई,होवत आज। कोन करत बइला ले,खेती काज? नौं सौ रुपिया घंटा,लेवत दाम। ट्रेक्टरवाले मन के,चमकै काम।। कइसे होय किसनहा,के उद्धार? घेरी-बेरी आथे,इही बिचार।। अब बिन खुशी हरेली,कइसे आय। महँगाई जिनगी ला,बड़ झुलसाय।। झुलस-झुलस के आघू,बढ़ते जाय। खून-पछीना ले ही,नाम कमाय। धरती दाई हरसे,जांगर देख। खरतरिहा मन बदले,किस्मत लेख।। जीतेन्द्र निषाद "चितेश" सांगली,जिला-बालोद

खाली दिमाँक,शैतान के घर

खाली दिमाँक,शैतान के घर। बने बउरबे त,बने जंतर-मंतर। लइका ले कहिथें सियान मन। अरे!धर ले बाबू,धियान अपन। झन कर गांजा,अउ दारु से यारी। कर ले नेवी,अउ अग्निवीर के तइयारी। अरे!झन बन सटोरिया,अउ जुआरी, कर ले बढ़िया खेती,अउ बों ले बारी। पढ़-लिख के झन कर,चोरी-चकारी, त फेर मार खाबे,पुलिस के भारी। भले कर ले,काकरो घर चौकीदारी, दू जून रोटी खाबे,रोज संगवारी। जब थक जाबे,तब नींद आही मन के, खाली दिमाँक ले,शैतान भागही दन के। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

साँस रूपी नगीना

इस दुनिया में अपना कौन सगा है? अपनों ने ही अपनों को सदा ठगा है। फिर भी मुस्कुराकर इसी दुनिया में जीना है। जब तक जीवन में साँस रूपी नगीना है। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

रोटी पीठा-दोहा छंद

रोटी पीठा-दोहा छंद पपची बिड़िया ठेठरी,खुरमी कस पकवान। खाके कतको झन बनँय,शूरवीर बलवान।। जेन करी लाड़ू चखँय,उन ओकर गुण गाँय। भीम बरोबर बाहुबल,अपन भुजा मा पाँय।। रोग असन अरि मन डरँय,भागँय उन रण छोड़। रोग निरोधक शक्ति ले,देह रहँय बेजोड़।। मिलँय जिहाँ पकवान ए,हर घर सरग समान। जग मा अइसन धाम हें,छत्तीसगढ़ महान।। रोटी पीठा के असल,करत हवंँव गुणगान। तइहा निर्मल हर जिनिस,रिहिन शुद्ध पकवान।। खाए पीए के जिनिस,जहर बरोबर जान। जग मा नइ हें शुद्ध जी,अब कोनो सामान। मनखे मन के मन तरी,कस के लोभ हमाँय। मिलवट करके खल बनँय,पइसा फकत कमाँय।। पइसा हा सब कुछ नहीं,जग मा पुण्य कमाव। मानवता के पाठ ला,सीखव खुदे सिखाव।। जैविक खेती सब करँय,ए पद्धति हे सार। तभ्भे मिलही अन्न मन,शुद्ध कृषक बाजार।। रइही सेहत हा बने,शुद्ध अन्न सब खाँय। रोटी पीठा के असल,मजा रोज के आँय।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद