धान बोवैया
सुनव अमरित बानी धान बोवैया मन बर,चना-गहूँ वाले मन। मजा आथे इन ल बीच बाजार फधित्ता करके जानेमन। देखव सब असली रंग,चना-गहूँ बोके अमृत बचाय के करय ढोंग। अमृत बचइया मन उतेरा उतेरे के काबर नइ करय जोंग। उतेरा के फसल खेत के नमी म पकथे,त अमृत सरबस बच सकथे। फेर गाँव के हितैषी मन दूध के धुले कस चना-गहूँ बोके नियाव करथे। चोरी एक रुपया के करव या पचास के कानून म धारा एक ही लगथे। फेर धान बोवैया मन बर चना-गहूँ वाले मन पंच परमेश्वर बनथे। सुवारथ म पद बर दिखावा करके चुनाव के मैदान म उतरथे। एक ही दल ले कई प्रत्याशी ठीहा म ठगनी माया कस ठगथे। गाँव बर हितवा प्रत्याशी के धान बोवैया बर हितवा सोच। सोच-समझके संगी देहू तुमन इन ल अपन कीमती वोट। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'