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धान बोवैया

सुनव अमरित बानी धान बोवैया मन बर,चना-गहूँ वाले मन। मजा आथे इन ल बीच बाजार फधित्ता करके जानेमन। देखव सब असली रंग,चना-गहूँ बोके अमृत बचाय के करय ढोंग। अमृत बचइया मन उतेरा उतेरे के काबर नइ करय जोंग। उतेरा के फसल खेत के नमी म पकथे,त अमृत सरबस बच सकथे। फेर गाँव के हितैषी मन दूध के धुले कस चना-गहूँ बोके नियाव करथे। चोरी एक रुपया के करव या पचास के कानून म धारा एक ही लगथे। फेर धान बोवैया मन बर चना-गहूँ वाले मन पंच परमेश्वर बनथे। सुवारथ म पद बर दिखावा करके चुनाव के मैदान म उतरथे। एक ही दल ले कई प्रत्याशी ठीहा म ठगनी माया कस ठगथे। गाँव बर हितवा प्रत्याशी के धान बोवैया बर हितवा सोच। सोच-समझके संगी देहू तुमन इन ल अपन कीमती वोट। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

अच्छा दिन

अच्छा दिन आ गे अच्छा दिन हमर आ गे संगी,बीतगे दस साल। अउ होगे हँव मैं खुशहाल संगी,होगे हँव मैं खुशहाल। अच्छा दिन के जुमला वादा करके,चाँद मा जाय के दिखाइस हवय सपना। पंद्रह लाख उड़के हमर खाता मा आ गे,नोटबन्दी मा गहना गुरिया ले,सजगे हमर अंग अंँगना। प्रधानमंत्री आवास योजना के'ओझल महल' के राजा बनाके कर दिस मालामाल। अउ होगे हँव मैं खुशहाल संगी,होगे हँव मैं खुशहाल। पेट्रोल-डीजल बिसाय के हवय मोर बस,फेर अपन गाड़ी ल छोड़के जावत हँव बस मा। काबर पेट्रोलियम पदार्थ हवय आरुग सस्ता,मोर रोजी हवय दुगुना'रोजगार गारंटी'के दम मा। एकरो'निधि'कम होगे सरकारी 'बजट' मा,मिलही बारो महीना रोजगार हर हाल? अउ होगे हँव मैं खुशहाल संगी,होगे हँव मैं खुशहाल। कतिक करँव सरकार के बड़ाई,दवई-खातू के कीमत निच्चट कम हे भाई। लागत कम आथे 'सम्मान निधि'ले,काबर हमर फसल के दाम छूथे ऊँचाई। रइथे किसनहा मन मजा मा,तभ्भे नेता-अभिनेता,दलाल मन लेथे गाड़ी,बनाथे मॉल। अउ होगे हँव मैं खुशहाल संगी,होगे हँव मैं खुशहाल। अच्छा दिन महँगाई जादा होय ले आही,त दिन दुगुनी रात चौगुनी आमजन करही विकास? होही किसनहा,कंगला मन क...

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि लागौं तोर जोहार महादेव,लागौं तोर जोहार । तोर करत हँव गोहार महादेव,आके तोर दुआर। होवत हवय कलजग मा,नंगत के लूट,हत्या अउ भ्रष्टाचार। कतको दुर्जन झोत्था मिलके,करत हवँय दुराचार। दुराचारी मन के नाश करे बर,आजा अपन त्रिशूल मा करके तेज धार। तोर करत हँव गोहार महादेव,आके तोर दुआर। हसदेव जइसे कतको जंगल मा,चलत हवय टंगिया-आरी। जंगली जानवर,चिरई चिरगुन के,नइहे हितवा,नइहे संगवारी। जंगल के विनाश करइया बर तांडव करत,अपन त्रिनेत्र ला फेर खोल दव एक बार। तोर करत हँव गोहार महादेव,आके तोर दुआर। खुद के सुख के चाह मा कतको मनखे मन,नइ चाहय दूसर के हित। वइसन मनखे मन के हिरदय मा भर दव परहित बर लबालब मया पिरीत। तभ्भे होही 'महाशिवरात्रि' के तोर किरपा ले,ए जग अउ कलजुग के उद्धार। तोर करत हँव गोहार महादेव,आके तोर दुआर। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद