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खाली दिमाँक,शैतान के घर

खाली दिमाँक,शैतान के घर। बने बउरबे त,बने जंतर-मंतर। लइका ले कहिथें सियान मन। अरे!धर ले बाबू,धियान अपन। झन कर गांजा,अउ दारु से यारी। कर ले नेवी,अउ अग्निवीर के तइयारी। अरे!झन बन सटोरिया,अउ जुआरी, कर ले बढ़िया खेती,अउ बों ले बारी। पढ़-लिख के झन कर,चोरी-चकारी, त फेर मार खाबे,पुलिस के भारी। भले कर ले,काकरो घर चौकीदारी, दू जून रोटी खाबे,रोज संगवारी। जब थक जाबे,तब नींद आही मन के, खाली दिमाँक ले,शैतान भागही दन के। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

साँस रूपी नगीना

इस दुनिया में अपना कौन सगा है? अपनों ने ही अपनों को सदा ठगा है। फिर भी मुस्कुराकर इसी दुनिया में जीना है। जब तक जीवन में साँस रूपी नगीना है। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

ज्ञान के आँगन का सवाल

*ज्ञान के आँगन का सवाल* जब-जब फंदे पर मिले शव, आवासीय विद्यालय में, तब कौन दोषी है, किसे सजा मिलेगी न्यायालय में? अब बार-बार घट रही घटनाएँ, ज्ञान के आँगन में, कौन सुध लेगा, जब चिराग बुझ रहे सावन में? वार्डन की निगरानी पर अब तो करना पड़ेगा सवाल, गुरु-शिष्य के बीच के रिश्ते का जानना होगा हाल। बच्चों के बीच दोस्ती-दुश्मनी का रखना होगा हिसाब, शासन-प्रशासन को देना होगा हर पालक को जवाब। क्या बच्चों की अनबन से ही शुरू होती है वो जंग? शायद वही बन जाता है, खुदकुशी का एक रंग। अवसाद हो, पढ़ाई का दबाव हो या कोई बाहरी लगाव, कारण कुछ भी हो, मूल में है निगरानी का अभाव। जीतेन्द्र निषाद'चितेश

हे गणपति महराज

हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जब गाँव-गली खोर म ठाड़े हे,कतको झन बनके दुःशासन अउ रावण। अरे!घर म सग्गे भाई-बाप घलो करै शोषण,अब कइसे होगे मनखेमन? तब घर-बन के बैरी ले कोन बचाही हम ला आज? हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। बिक्कट होवत हे दुराचार अबला समझ के,नारी अउ अबोध लड़की सन। जेन नइ देखे राहय जिनगी के एको बसंत,तेकर बर मरद बनै जबरन। दुराचारी मरद के शिकार बर तोला बने ल परही बाज। हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जेन पशु बरोबर करै बेवहार,भाग मढ़ा दे वोकर गरदन काट के। जेन लबारी के दलील दे अदालत म हवसी बर मार चूंदी हपाट के। अइसन कानून बने तभ्भे नियाव पाही तिरिया समाज। हे गणपति महराज,हे गणपति महराज। अब कान्हा सही आके बचा दे हमर लाज। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

मटकी ल फोड़

मटकी ल फोड़,पइसा बटोर,सुन ले संगी मोर। कोशिश कर ले आके तहूँ ,एक घाँव जी तोड़ । डोकरी घलो हवय रेस म,डोकरा घलो हवय टेस म। आँखी म बाँध मया के पट्टी,अरे! मया के बंधना ल छोड़। जिनगी का हे?सुख-दुख के मेला,ये तन का हे? माटी के ढेला। ये जग ल छोड़ तैं जाबे अकेला,अब हरि ले नाता जोड़। सबले बड़का ऊपरवाला खिलाड़ी,बाकी जम्मो झन हवय अनाड़ी। करम के लाठी तोर हाथ म,सत के रद्दा ले कभू  मुँहू झन मोड़। कइसन मटकी ल तैहा फोड़बे,कइसन पइसा ल तैहा बटोरबे? गरब के मटकी ल तैहा फोड़,हरिनाम के पइसा ल तैहा बटोर। मटकी ल फोड़,पइसा बटोर,सुन  ले संगी मोर। कोशिश कर ले आके तहूँ ,एक घाँव जी तोड़। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

सारी के बिहाव म

सारी के बिहाव म भांटो नाचै अकेल्ला अकेल्ला। सजनी बिन सारी प्यारी,भागै दुम दबाके पल्ला। आके सारी मोर संग नाच लव,कनिहा जोरी जोरी। साढ़हू घलो संग म हावय,मजा आही थोरी थोरी। सास के बाद डेड़ सास हे,यहू नत्ता खासमखास हे। बड़का साढ़हू,बड़का भइया,लागै अभी तीजा उपास हे। सास लागै महतारी बरोबर फेर देथे अब्बड़ गारी। छितका कुरिया के तोर बेटी लागै सौंहत राजकुमारी। गंजहा नइ हँव,मंदहा नइ हँव,हांँवव मैं बेलबेलहा। फेर बारी-बखरी बुता करथँव,नइ राहंँव मैं ठेलहा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

इंसाफ बचा कहाँ है?

कलयुग में गरीब के लिए इंसाफ बचा कहाँ है? और दौलतमंद के लिए कानून में सजा कहाँ है? यही सच्चाई है इस दुनिया की खासकर भारत की। यहाँ ईमान भी बिक जाता है ताकत देख दौलत की। फिर अपराधी को कब,कहाँ और कैसे सजा मिलेगी? अरे!वकील के अच्छे दलील से,जिंदगी भर मजा मिलेगी। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"