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बैलाडीला के पहाड़ी

पूरा उखड़ जाही बैलाडीला के पहाड़ी। फेर नइ बनही पक्की सड़क संगवारी। गाँव लावा-लोहा,पुरेंगेल अउ बैंगपाल मा, एनएमडीसी अउ सरकार के मकड़जाल मा। बैलाडीला के लोहा जब जा सकत हे जापान, फेर इहाँ नइ बन सकत हे शिक्षा के मकान। कब तक सुते रहिबे बस्तर के वासी। पूरा उखड़ जाही बैलाडीला के पहाड़ी। बिना अस्पताल के नल-जल अउ जोत बिन। दुख मा बीते मनखे के जिनगी छिन-छिन। कच्ची सड़क मा आथें मनखे वाहन बिन, ले जाथें किरंदुल ले राशन दिन गिन-गिन। बस्तर के विकास बर तब आही पारी। पूरा उखड़ जाही बैलाडीला के पहाड़ी। फेर नइ बनही पक्की सड़क संगवारी। पूरा उखड़ जाही बैलाडीला के पहाड़ी। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

सारी के बिहाव म

सारी के बिहाव म,भांँटो नाचे अकेल्ला। सजनी बिन सारी प्यारी अउ सारी भागै पल्ला। आके सारी,मोर संग नाच ले कनिहा जोरी-जोरी। साढ़हू घलो संग म हावय,मजा आही थोरी-थोरी। बिहाव म डेढ़ सास हे,नाच लव बेरा खासमखास हे। बड़का साढ़हू नइ नाचे,लागे अभी तीजा उपास हे। सास लागे महतारी बरोबर,फेर कइथे रटरट भारी। मोर छितका कुरिया म लागे,तोर बेटी राजकुमारी। गंजहा नइ हँव,मंदहा नइ हँव,हांँवव मैं बेलबेलहा। फेर बारी-बखरी बुता करथँव,नइ राहंँव मैं ठेलहा। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

अपन दाई ल दाई समझे

अपन दाई ल दाई समझे, अउ मोर दाई ल सास। एक्के आँखी म देखबे सजनी, तब्भे बनही रिश्ता खास। अपन महतारी जस देबे मान, तस रखही महतारी तोर धियान। करबे कल्लर कइयाँ हरदम, महतारी के आँखी रइही नम। कतको पढ़ ले बी.ए,एम.ए, नइ होबे परिवार म पास। डिग्री फकत नाम के रइही, कर ले मोर गोठ म बिश्वास। अढ़ही बनके सीखबे सजनी, घर के कक्षा तोला आही रास। अपन दाई ल दाई समझे, अउ मोर दाई ल सास। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

दीवाना था तेरे प्यार में

चाहत थी इस कदर दीवाना था इस कदर,तेरे प्यार में, मेरा यार सुरेंदर। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। उसने घर बसा लिया अपना, किसी और को बना लिया सजना। मेरे यार की न गलती थी, किस्मत उससे जलती थी। पता नहीं क्यों वह चली गई? सुरेंदर को तलाक देकर घर से। जीवन के आखिरी पल में वह रोया, अपनी पत्नी को याद करके। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। -तुम्हारे यार की कलम से जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

आँसू

आँसू बिन मांगे जीव ल पीरा दे हे, आँसू के रूप म हीरा दे हे। बेरा कुबेरा कभू आ जाथे, सुख के बेरा दुख समाथे। पीरा मन के बोझ बढ़ाथे, अउ आँसू,मन हल्का कर जाथे। जे गोठ नइ कर सके जबान, बिन कहे आँसू करे बखान। आँसू कभू कमजोरी नोहे जेकर सो तै रो सकस वो तोर ए। कतको मिल जाही आँसू पोछइया, फेर बिरले झन जाने कीमत भइया। कइसे करंँव तोर गुणगान, आँसू ले आवै पथरा म परान। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

हे घनश्याम!

सुरता आथे मोला तोर, हिरदे मा मारे पीरा हिलोर। कहाँ चल देस छोड़ के, दाई-बहिनी ले मुँह मोड़ के। अपन अंगना अपन खोर, घेरी-बेरी रद्दा देखे तोर। का करम तै करे संगी, चल दे भारी झटकी। नइ मिल सकन तोर ले, बँधे हन साँस के डोर ले। हे घनश्याम!सुबे-शाम, छिन-छिन लेवत तोरेच नाम। टूटही जब साँस के डोर, भेंट होही तोर अउ मोर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

पल्ला दाई घर झन जाए कर

गोरी मोला अब्बड़ सताथस, फेर मया घलो अब्बड़ जताथस। रीस म कहिबे,कुछु तोला त, पल्ला दाई घर काबर जाथस? सजना के बोली नइ सुहावै, सास-ससुर मोला नइ भावै। ननंद के करनी आगी लागै, देरानी-जेठानी गोली दागै। पल्ला दाई घर मैंहा जाथँव, फेर सजना के मान गँवाथँव। पल्ला दाई घर झन जाए कर, घर-समाज म मान पाए बर। बोली ले झन बाण मारे कर, रीस के आगी झन बारे कर। सजना के हिरदे मा गोरी मया के नवा जोत जगा दे कर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'