किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। मेहनत की रोटी से अपनों का पेट भरता हूँ। खेती में कभी लाभ होता है, और कभी हानि होती है। कभी सिर पर कर्ज चढ़ जाता है, तो कभी जीने में परेशानी होती है। फिर भी अपने कर्म पथ पर अडिग रहता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। कीमत बढ़ गई,दवाई-खाद की, आमदनी घट गई,अवनि के औलाद की। मजे में है नेता-अभिनेता,व्यापारी और कर्मचारी, कौन सुनेगा?कौन देखेगा?किसान की लाचारी। अपने आप से ही,पागलों की तरह बात करता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। मौसम भी कड़ी परीक्षा लेता है,धरती के भगवान की, कैसे सोयी किस्मत जागेगी,मेहनतकश किसान की? सावन-भादों में कभी फसलें,बिन बारिश मर जाती है, और बैसाख-जेठ में बारिश,फसलों को डुबोकर जाती है। ऐसी दशा में भी खुशी-खुशी,विधि के विधान को प्रणाम करता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद