पल्ला दाई घर झन जाए कर
गोरी मोला अब्बड़ सताथस, फेर मया घलो अब्बड़ जताथस। रीस म कहिबे,कुछु तोला त, पल्ला दाई घर काबर जाथस? सजना के बोली नइ सुहावै, सास-ससुर मोला नइ भावै। ननंद के करनी आगी लागै, देरानी-जेठानी गोली दागै। पल्ला दाई घर मैंहा जाथँव, फेर सजना के मान गँवाथँव। पल्ला दाई घर झन जाए कर, घर-समाज म मान पाए बर। बोली ले झन बाण मारे कर, रीस के आगी झन बारे कर। सजना के हिरदे मा गोरी मया के नवा जोत जगा दे कर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'