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अपन दाई ल दाई समझे

अपन दाई ल दाई समझे, अउ मोर दाई ल सास। एक्के आँखी म देखबे सजनी, तब्भे बनही रिश्ता खास। अपन महतारी जस देबे मान, तस रखही महतारी तोर धियान। करबे कल्लर कइयाँ हरदम, महतारी के आँखी रइही नम। कतको पढ़ ले बी.ए,एम.ए, नइ होबे परिवार म पास। डिग्री फकत नाम के रइही, कर ले मोर गोठ म बिश्वास। अढ़ही बनके सीखबे सजनी, घर के कक्षा तोला आही रास। अपन दाई ल दाई समझे, अउ मोर दाई ल सास। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

दीवाना था तेरे प्यार में

चाहत थी इस कदर दीवाना था इस कदर,तेरे प्यार में, मेरा यार सुरेंदर। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। उसने घर बसा लिया अपना, किसी और को बना लिया सजना। मेरे यार की न गलती थी, किस्मत उससे जलती थी। पता नहीं क्यों वह चली गई? सुरेंदर को तलाक देकर घर से। जीवन के आखिरी पल में वह रोया, अपनी पत्नी को याद करके। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। -तुम्हारे यार की कलम से जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

आँसू

आँसू बिन मांगे जीव ल पीरा दे हे, आँसू के रूप म हीरा दे हे। बेरा कुबेरा कभू आ जाथे, सुख के बेरा दुख समाथे। पीरा मन के बोझ बढ़ाथे, अउ आँसू,मन हल्का कर जाथे। जे गोठ नइ कर सके जबान, बिन कहे आँसू करे बखान। आँसू कभू कमजोरी नोहे जेकर सो तै रो सकस वो तोर ए। कतको मिल जाही आँसू पोछइया, फेर बिरले झन जाने कीमत भइया। कइसे करंँव तोर गुणगान, आँसू ले आवै पथरा म परान। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

हे घनश्याम!

सुरता आथे मोला तोर, हिरदे मा मारे पीरा हिलोर। कहाँ चल देस छोड़ के, दाई-बहिनी ले मुँह मोड़ के। अपन अंगना अपन खोर, घेरी-बेरी रद्दा देखे तोर। का करम तै करे संगी, चल दे भारी झटकी। नइ मिल सकन तोर ले, बँधे हन साँस के डोर ले। हे घनश्याम!सुबे-शाम, छिन-छिन लेवत तोरेच नाम। टूटही जब साँस के डोर, भेंट होही तोर अउ मोर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

पल्ला दाई घर झन जाए कर

गोरी मोला अब्बड़ सताथस, फेर मया घलो अब्बड़ जताथस। रीस म कहिबे,कुछु तोला त, पल्ला दाई घर काबर जाथस? सजना के बोली नइ सुहावै, सास-ससुर मोला नइ भावै। ननंद के करनी आगी लागै, देरानी-जेठानी गोली दागै। पल्ला दाई घर मैंहा जाथँव, फेर सजना के मान गँवाथँव। पल्ला दाई घर झन जाए कर, घर-समाज म मान पाए बर। बोली ले झन बाण मारे कर, रीस के आगी झन बारे कर। सजना के हिरदे मा गोरी मया के नवा जोत जगा दे कर। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

मोर नोनी

छुनुक-छुनुक पैरी बाजे तोर नोनी। पाँव मा सुघ्घर साजे मोर नोनी। कका किंजारे सौंहे-सौंहे तोला, रोज अटल चऊँक ह बाट जोहे तोला। किलकारी तोर जोश भरे मन मा, जीवन अमृत लागे एक क्षण मा। अइसे हे मधुर मुस्कान तोर, दुखी मन सुखी हो जाथे मोर। अटल चऊँक के अंगना गमकत हे, नोनी के रूप फूल जइसे लवकत हे। भौंरा बतावै गाँव भर मा घूम-घूम के, कोयली कूके बाग मा झूम-झूम के। सुनके गुरतुर बोली तोर नोनी, चिरई चहके,मैं भाव-विभोर नोनी। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

हरेली तिहार

विषय-हरेली हरे हरेली पहिली,हमर तिहार। करय किसनहा मन हा,जय जोहार।। खेती संग मितानी,घर-संसार। रोजी-रोटी देवय,खेत हमार।। करय किसनहा खेती,बिन आराम। बढ़त हवय खातू के,नंगत दाम।। लादन देवय एसो,दुकानदार। हर दुकान के होगे,नाटक झार।। ट्रेक्टर ले जोताई,होवत आज। कोन करत बइला ले,खेती काज? नौं सौ रुपिया घंटा,लेवत दाम। ट्रेक्टरवाले मन के,चमकै काम।। कइसे होय किसनहा,के उद्धार? घेरी-बेरी आथे,इही बिचार।। अब बिन खुशी हरेली,कइसे आय। महँगाई जिनगी ला,बड़ झुलसाय।। झुलस-झुलस के आघू,बढ़ते जाय। खून-पछीना ले ही,नाम कमाय। धरती दाई हरसे,जांगर देख। खरतरिहा मन बदले,किस्मत लेख।। जीतेन्द्र निषाद "चितेश" सांगली,जिला-बालोद