खाली दिमाँक,शैतान के घर
खाली दिमाँक,शैतान के घर। बने बउरबे त,बने जंतर-मंतर। लइका ले कहिथें सियान मन। अरे!धर ले बाबू,धियान अपन। झन कर गांजा,अउ दारु से यारी। कर ले नेवी,अउ अग्निवीर के तइयारी। अरे!झन बन सटोरिया,अउ जुआरी, कर ले बढ़िया खेती,अउ बों ले बारी। पढ़-लिख के झन कर,चोरी-चकारी, त फेर मार खाबे,पुलिस के भारी। भले कर ले,काकरो घर चौकीदारी, दू जून रोटी खाबे,रोज संगवारी। जब थक जाबे,तब नींद आही मन के, खाली दिमाँक ले,शैतान भागही दन के। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'