दीवाना था तेरे प्यार में
चाहत थी इस कदर दीवाना था इस कदर,तेरे प्यार में, मेरा यार सुरेंदर। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। उसने घर बसा लिया अपना, किसी और को बना लिया सजना। मेरे यार की न गलती थी, किस्मत उससे जलती थी। पता नहीं क्यों वह चली गई? सुरेंदर को तलाक देकर घर से। जीवन के आखिरी पल में वह रोया, अपनी पत्नी को याद करके। मरते दम तक भूल न सका, चाहत थी इस कदर। -तुम्हारे यार की कलम से जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'