पार्किंग
गाड़ी ल मंच के आघू म रखके गैरी झन मताव जी।
बोल दीही कोनो त बकबक करके झन सताव जी।
रामसत्ता मंच के तीर,पार्किंग ल देख मोर मन होय अधीर जी।
दर्शक मन बइठही कहाँ?बारिश म मैं खोजँव तदबीर जी।
सियान बनके अड़हा झन बनव गाँव के सियान मन।
गाड़ी ल पार्किंग म रखके,दिखाव सज्जनता सब झन।
बने मनखे ल चार समाज म बुलाके झन करहू बदनाम जी।
बोलो एक घांँव प्रेम से जय श्री राम,जय राम जी।
जीतेन्द्र निषाद"चितेश"
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