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अरविंद सवैया

*आज के अभ्यास - अरविंद सवैया* भइगे मनखे रसहीन घलो,कतको बढ़िया कविता सुन रोज। सुन थोर कही बहुते बढ़िया,करही  बड़ शोर उही हर ओज। कर पुस्तक आज विमोचन गा,कल तो मुड़ के नइ देखय सोज। मनखे मन ला कवि फोकट मा,जब बाँटय वोकर नंगत खोज ।

दोहा छंद

झिल्ली ले घुरवा भरे,कइसे बनही खाद । धनहा अउ परिया बनय,कब आही जी याद ।। गोबर पैरा संग मा,घुरवा मा तैं डार । सर-गल के बनही इही,खातू सबले सार ।।

कविता

छत्तीसगढ़ के माटी ले उबजे,सोनहा धान के बाली ग । चारो मुड़ा बोहावत गंगा,नदी,नरवा अउ नाली ग । संझा-बिहनिया पारत पाटी,रापा धरे नर-नारी ग । कायाफूल चढ़ावै भुँइयाँ,करय खेती बारी ग । हरियर हरियर खेती-खार,घाम घलो संगवारी ग । नाचे करमा,गाये ददरिया,रोपा लगावै नर नारी ग । लहलहावत जिहाँ भइया,मया के ओनहारी ग । एक लोटा देके पानी,पहुना भजन दुआरी ग । नइ सोवय कोनो लांघन-भूखन,राजा-रंक भिखारी ग । पेटभर मिलय,पेटभर खावय,खावय बरा सोंहारी ग ।

कविता

करजामाफ होगे ओकर,जेकर बैंक म कर्ज । केसीसी,सहकारी समिति म,हावय नाम दर्ज । बसुंदरा मन के का होहि ?समझ नी आय साफ, करे सौतेलापन,समझें ! करजामाफी  फर्ज ।

दोहा छंद

किस्सा कुर्सी के सुनव,पद बर हाहाकार । नाक-कान फूटन लगे,कइसन ये सरकार ।।

दोहा छंद-राजिम मेला

माँघी पुन्नी मा लगय,राजिम मेला धाम । दान पुन्न कतको करय,मनखे प्रभु के नाम ।। राजिम मेला धाम मा,मन के कचरा फेंक । नेकी गठरी बाँध के,करले पुन्न अनेक ।।

दोहा छंद-महतारी

महतारी ममता करे,सौंहत देवी जान । सात धार के दूध पी,लइका होय जवान ।।1 महतारी के मान कर,झन कर गा अपमान । पाल पोंसके तोर बर,बनगे माँ भगवान ।।2  कर ले पूजा रोज के,मंदिर-मस्जिद छोड़ । तीन लोक मा नइ मिलै,माँ के कोनो जोड़ ।।3 लाँघन भूखन माँ रहै,लइका खावै सेब । लइका भूलै बाढ़ के,माँ मा देखै एब ।।4 महतारी के पाँव मा,हावय चारो धाम । कर ले सेवा रोज के,बनही बिगड़े काम ।।5

दोहा छंद

जड़काला होगे खतम,आगे फेर बसंत । नइ लागै गरमी तको ,मउँसम रहिथे कंत ।।

दोहा छंद-भाजी साग

खाले अघ्घन राँध के,पालक भाजी साग । खून कमी के रोग हा,जाही तन ले भाग ।।     

दोहा छंद

तरिया गोदी काम ला,गैंती धरके कोड़ । माटी झउहाँ जोर के,फेंक पार जी तोड़ ।।

दोहा छंद

लोकतंत्र के खेत मा,हवय चुनावी रोग । नेता मन फाँफा सहीं,चुहक करत हे भोग ।। जनता मुखिया खुद चुनै,लोकतंत्र के नींव । पसिया बर जनता मरे,मुखिया पीयय घींव ।।

दोहा छंद-बनिहार

मालिक मन बनिहार ले,लेथे अब्बड़ काम । वोकर एवज मा उचित,नइ देवय गा दाम ।। बनी करय बनिहार हा,गाँव-शहर मा खोज । तभ्भे मिलथे पेट भर,पानी पसिया रोज ।। चाहत हँव मैं रोज के,चटनी बासी खाँव । तन के जाँगर पेरके,धरती ला सिरजाँव ।।

दोहा छंद

वैप्रचित्त दानव करिस,जग मा हाहाकार । रक्तदंतिका रूप धर,दिये दाँत मा मार ।। धरे खड़ग तलवार माँ,बना अचंभित रूप । रक्तबीज के नास बर,भागे धूपे-धूप ।। नव दिन के नवरात मा,देवी दरसन योग । माई के आसीस ले,जिनगी मा सुख भोग ।। जिनगी के नवरात मा,सुख हर चइत कुँवार । देवी दरसन मौत के,जनम-मरण के द्वार ।।

दोहा छंद

कंचन कुंडल कान मा,टिकली माथ लगाय । नयना काजर आँज के,सजनी सम्हरत जाय ।।

दोहा छंद

दाई बाबू रोज के,खावै बासी पेज । बाई बुध मा देय बर,बेटा करे गुरेज ।। ये जिनगी अनमोल हे,दया-मया झन छोड़ । मँदरस बानी बोल के,सबले नाता जोड़ ।।

दोहा छंद

राम राम के बेर मा,झन कर कउँआ काँव । भज ले संगी राम ला,खुशी मिले हर घाँव ।। राम नाम मा जोर हे,कर संगी तैं जाप । अतका पुन्न सकेल ले,होय कभू झन पाप ।।

दोहा छंद

मन मा भज ले राम ला,रोज सुबे अउ शाम । बनही बिगड़े बात हा,भवसागर के धाम ।।

दोहा छंद-माँदी भात

विषय-माँदी भात बर बिहाव के शान ए,लाड़ू मोतीचूर। खावव संगी खोज के,मौका हे भरपूर।। काबर माँदी भात के,मनखे करथें साध। हर समाज के रीत ये,लादय कर्ज अबाध।। बिना कलेवा होय नइ,काबर माँदी भात। कतको मनखे ला करय,जीते जी आघात।। निःपुरतः बर बोझ ए,बड़हर बर ए शान। हर समाज ये जान लव,खोवत कोन परान।। मरनी म घलो खाव जी,चोग्गर सादा भात। बिना कलेवा तान के,खावव तातेतात।। जइसन पुरे खवाव जी,अइसन होय रिवाज।। तभ्भे बनही विश्व मा,सुघ्घर संत समाज।। जीतेन्द्र निषाद "चितेश" सांगली,गुरुर,जिला-बालोद

उल्लाला छंद

काम वासना छोड़ के,कर संगी तैं जाप जी । तन के जतका रोग हे,जाही अपने आप जी ।।

उल्लाला छंद

करव सदा मतदान गा,नेक हरे ये काम । लोकतंत्र मा देश बर,सुघ्घर पावन धाम ।।