केशकाल घाटी


चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी।
सरग ल देखे बर एक घांँव,तेलीन दाई के मुंँहाटी।

जल अमरित सही लागै जब बादर ह बरसे।
तेलीन दाई के चरण पखारे बर जिनगी भर तरसे।
धरती सही मटका म हमा जथे अमरित कस पानी।
रुख-राई ल मिलथे,त सँवर जथे उँकर जिनगानी।
लगथे मनभावन,कुदरत के यौवन आती-जाती।
चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी।

मोह-माया के भाँवर म जिनगी भर परे हे मनखे।
तेलीन दाई के धाम बारा भाँवर के रद्दा म सँटके।
देवत हावै दरसन आठो पहर,करलौ दरस जी भर के।
तर जाही तोर चोला जनम-मरण के फेर ले उबर के।
जस गा लौ,माथा टेक के कभू संझा कभू पहाती।
चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी।

पवन चलै धीरे-धीरे,मन ठुमकै धीरे-धीरे।
कांँही के संसो नहीं,पहाड़ी के तीरे तीरे।
दुख के खँइहा पटा जाही,संतोष के सुख म।
आशीष मिलै तेलीन दाई के,घाटी के हर रुख म।
दरस करे के बाद,बरस बरस जीये बर साथी।
चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी।
सरग ल देखे बर एक घांँव तेलीन दाई के मुंँहाटी।
चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी।

जीतेन्द्र निषाद"चितेश"




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