हे घनश्याम!
सुरता आथे मोला तोर,
हिरदे मा मारे पीरा हिलोर।
कहाँ चल देस छोड़ के,
दाई-बहिनी ले मुँह मोड़ के।
अपन अंगना अपन खोर,
घेरी-बेरी रद्दा देखे तोर।
का करम तै करे संगी,
चल दे भारी झटकी।
नइ मिल सकन तोर ले,
बँधे हन साँस के डोर ले।
हे घनश्याम!सुबे-शाम,
छिन-छिन लेवत तोरेच नाम।
टूटही जब साँस के डोर,
भेंट होही तोर अउ मोर।
जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'
Comments
Post a Comment