अपन दाई ल दाई समझे

अपन दाई ल दाई समझे,
अउ मोर दाई ल सास।
एक्के आँखी म देखबे सजनी,
तब्भे बनही रिश्ता खास।

अपन महतारी जस देबे मान,
तस रखही महतारी तोर धियान।
करबे कल्लर कइयाँ हरदम,
महतारी के आँखी रइही नम।

कतको पढ़ ले बी.ए,एम.ए,
नइ होबे परिवार म पास।
डिग्री फकत नाम के रइही,
कर ले मोर गोठ म बिश्वास।

अढ़ही बनके सीखबे सजनी,
घर के कक्षा तोला आही रास।
अपन दाई ल दाई समझे,
अउ मोर दाई ल सास।

जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

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