नकटा के नाक कटाय


नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ।
देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय।

जब चोरहा मनखे मन नियाव के सिंहासन म बिराजैं।
करे निरपराधी के फैसला,जे मेहनत के पागा बाँधैं।
चोरी करे सहीं,काकरो बहू-बेटी ल छेड़े सहीं,
अपराधी बनाके गाँव-समाज ले छोड़े के हुकुम सुनाय।
नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ।

चोर के दाढ़ी म तिनका,ये कहावत सही जनाय।
कोनो आन जात के बेटी ल खुदे उड़हरिया भगाय।
अउ काकरो बेटी आन जात घर खुदे उड़हरिया जाय।
नाक ल ऊँचा करके,सिधवा ल दंड के भागी बतायँ।
नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ।

नकटा मन कुटेलहा परे अउ नाक सवा हाथ बाढ़े।
बने मनखे के बीच बाजार,इज्जत के पैजामा उतारे।
कोनो कंगला ल सता के ये मन फोकट म देवय राय।
खुद के घर के गाथा ये मन ल काबर याद नइ आयँ?
नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलाय।

अमरित बचइया मन,नशेड़ी मन बर आरती सजायँ।
सट्टा लिखइया-जुआ खेलइया मन बिक्कट बढ़ावा पाय।
कोन उँकर हाथ बाँधैं हे,काबर आवाज नइ उठायँ।
बिन पाती,बीच बजार ये मन ल काबर नइ बलायँ
नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ।
देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय।

जीतेंद्र निषाद'चितेश'

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