दोहा-महँगाई
दोहा
महँगाई अजगर सहीं,लीलत हावय सोज।
आम आदमी रोज के,बनत हवय बस भोज।।
खाद्य तेल या अन्न हो,या डीजल पेट्रोल।
कँगला-मँझला वर्ग बर,जम्मों जिनिस अमोल।।
दाम हवय हर खाद के,तभो बिसाय किसान।
ऊँकर जम्मों चीज के,कीम्मत नीर समान।।
लोकतंत्र के खेत मा,हवय चुनावी रोग।
नेता मन फाँफा सहीं,चुहक करत हे भोग।।
जनता मुखिया खुद चुनें, लोकतंत्र के नींव।
पसिया बर जनता मरे,मुखिया पीयय घींव।।
कुर्सी के पाछू पड़े,जनसेवक इंसान।
कइसे होही देश के,स्वारथ मा उत्थान।।
जीतेन्द्र निषाद "चितेश"
सांगली,गुरुर,जिला-बालोद
Comments
Post a Comment