शंकर छंद

शंकर छंद

मन हा मइला कतको झन के,देह हवय निरोग।
रोय कबीरा जब ये देखे,करय योगी भोग।
अब का होही जनमानस के,करय अलकर संत। 
चेत हराही मनखेमन के,दान पुन के अंत।

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