हरिगीतिका छंद अब जान लव ये राज ला सब,साफ रखिहौ गाँव ला। कचरा ल कूड़ादान मा रख,याद रख लव ठाँव ला।। सब रोग-दुरिहा भागही जी,चार पइसा बाँचही। बीमार नइ पड़हू त संगी,कोन काबर जाँचही।।
दोहे रक्तदान के काम मा,सरलग कर सहयोग। अपन लहू ला दान कर,परमारथ सुख भोग।। रक्तदान के अहमियत,एक सिखावै पाठ। पर के जिनगी नित बचा,झन कर हिरदै काठ।। जगही जब संवेदना,पर के दुख ला देख। मानवता तभ्भे रही,मनखे तरी सरेख।। मानवता के गुण बिना,रक्तदान नइ होय। कतको मनखे प्राण ला,बिपत परे मा खोय।। धर सकथे विपदा कभू,दुर्घटना कस रूप। प्रसवकाल के संग मा,रक्तस्त्राव कस कूप।। हीमोफिलिया संग मा,ल्यूकिमिया के रोग। अइसन रोगी ला लगै,सदा लहू के भोग।। सदा जरूरतमंद बर,अपन लहू ला देव। इसन रक्तदाता सदा,अघुवा रह स्वयमेव।। जीयत भर देके लहू,अपन कमा ले साख। फेर मरे के बाद तैं,होबे संगी राख।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद
वैप्रचित्त दानव करिस,जग मा हाहाकार । रक्तदंतिका रूप धर,दिये दाँत मा मार ।। धरे खड़ग तलवार माँ,बना अचंभित रूप । रक्तबीज के नास बर,भागे धूपे-धूप ।। नव दिन के नवरात मा,देवी दरसन योग । माई के आसीस ले,जिनगी मा सुख भोग ।। जिनगी के नवरात मा,सुख हर चइत कुँवार । देवी दरसन मौत के,जनम-मरण के द्वार ।।
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