दोहे रक्तदान के काम मा,सरलग कर सहयोग। अपन लहू ला दान कर,परमारथ सुख भोग।। रक्तदान के अहमियत,एक सिखावै पाठ। पर के जिनगी नित बचा,झन कर हिरदै काठ।। जगही जब संवेदना,पर के दुख ला देख। मानवता तभ्भे रही,मनखे तरी सरेख।। मानवता के गुण बिना,रक्तदान नइ होय। कतको मनखे प्राण ला,बिपत परे मा खोय।। धर सकथे विपदा कभू,दुर्घटना कस रूप। प्रसवकाल के संग मा,रक्तस्त्राव कस कूप।। हीमोफिलिया संग मा,ल्यूकिमिया के रोग। अइसन रोगी ला लगै,सदा लहू के भोग।। सदा जरूरतमंद बर,अपन लहू ला देव। इसन रक्तदाता सदा,अघुवा रह स्वयमेव।। जीयत भर देके लहू,अपन कमा ले साख। फेर मरे के बाद तैं,होबे संगी राख।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद
*ज्ञान के आँगन का सवाल* जब-जब फंदे पर मिले शव, आवासीय विद्यालय में, तब कौन दोषी है, किसे सजा मिलेगी न्यायालय में? अब बार-बार घट रही घटनाएँ, ज्ञान के आँगन में, कौन सुध लेगा, जब चिराग बुझ रहे सावन में? वार्डन की निगरानी पर अब तो करना पड़ेगा सवाल, गुरु-शिष्य के बीच के रिश्ते का जानना होगा हाल। बच्चों के बीच दोस्ती-दुश्मनी का रखना होगा हिसाब, शासन-प्रशासन को देना होगा हर पालक को जवाब। क्या बच्चों की अनबन से ही शुरू होती है वो जंग? शायद वही बन जाता है, खुदकुशी का एक रंग। अवसाद हो, पढ़ाई का दबाव हो या कोई बाहरी लगाव, कारण कुछ भी हो, मूल में है निगरानी का अभाव। जीतेन्द्र निषाद'चितेश
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