सदगुरू मिलिस नाही
सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। नित हरि गुण गावय,काम करय रसिक राजा के। कलजुग के गुरु भक्ति बिन,सदगुरु बनय परजा के। पाँव परय असल चेला बिछल के गुरु दरबार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। चेला का करय,उहू भरम मा परय। गुरु के अलकर करनी नजरबंद रहय। कइसे होही बेड़ापार,जिनगी मझधार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। घर मा दाई-ददा अउ भाई-बहिनी, लइका-सियान के गजब कहिनी। देखय अउ सुनय बर मिलय,ये संसार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। संग मा रत्नावली सहीं,जब मिल जावय गुरु। तुलसीदास सहीं चेला,पावय पाठ-पीड़हा शुरु। तब गुरुमंत्र मा तरही मनखे,घर-दुआर,परिवार मा सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद