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Showing posts from January, 2025

गुरुजी बनके

का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। सरकार के गलती गाल म तमाचा सहीं लागे। अउ हाई कोर्ट के आदेश छाती म खंजर दागे। चेला से छुटगे गुरुजी के नाता क्षण भर म झट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? गुजरगे महीना कई बिन पद के तूता धरनास्थल म। डबल इंजन सरकार नइ करिन समायोजन अपन बल म। दुलरवा दरोगा ले डंडा के अंडा खवा दिन बिन कहे फट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? दण्डाशरण पँइयाँ लागेंव बीच बजार म अउ का करँव? अपमान ल मान समझेंव बीच बजार म अउ का करँव? ज्ञान के दाता ल भिखमंगा बना डरिन भिखमंगा मन हुकूमत ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? आज नइते काली कोनो मोरो सुध लिही इही आस म। फेर चलत हवय सुंँवासा सरकारी मरघट के पास म। जीयत हँव गुरुजी के पद बर,अपन हक बर,अपन हठ ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

नकटा के नाक कटाय

नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जब चोरहा मनखे मन नियाव के सिंहासन म बिराजैं। करे निरपराधी के फैसला,जे मेहनत के पागा बाँधैं। चोरी करे सहीं,काकरो बहू-बेटी ल छेड़े सहीं, अपराधी बनाके गाँव-समाज ले छोड़े के हुकुम सुनाय। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। चोर के दाढ़ी म तिनका,ये कहावत सही जनाय। कोनो आन जात के बेटी ल खुदे उड़हरिया भगाय। अउ काकरो बेटी आन जात घर खुदे उड़हरिया जाय। नाक ल ऊँचा करके,सिधवा ल दंड के भागी बतायँ। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। नकटा मन कुटेलहा परे अउ नाक सवा हाथ बाढ़े। बने मनखे के बीच बाजार,इज्जत के पैजामा उतारे। कोनो कंगला ल सता के ये मन फोकट म देवय राय। खुद के घर के गाथा ये मन ल काबर याद नइ आयँ? नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलाय। अमरित बचइया मन,नशेड़ी मन बर आरती सजायँ। सट्टा लिखइया-जुआ खेलइया मन बिक्कट बढ़ावा पाय। कोन उँकर हाथ बाँधैं हे,काबर आवाज नइ उठायँ। बिन पाती,बीच बजार ये मन ल काबर नइ बलायँ नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जीतेंद्र निषाद'चितेश'

माया के बजार

माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जिनगी भर करे'संगी'मोर मोर मोर, बात थोरिक गुन ले,इहाँ नहीं कोनो तोर। लोभ म मोहाके,अपजस धन कमाएस, जनसेवा बिसराके,हरि सेवा गँवाएस। पर ल पीरा देके तोर चोला कइसे तरही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। जवानी म बूड़े'संगी'सुवारथ मया म। जीयत भर नइ जानेस दया धरम करे ल। मन मंदिर म कभू दीया नइ जलाएस? हरिनाम के कंठ ले कभू जस नइ गाएस? हरि भजन बिन तोला मुक्ति कइसे मिलही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। गोविंद ल पाए बर गुरु के सुमरनी। करे ल परही सुधार अपन करनी। जिनगी के बेड़ा घलो पार लगही। अंत समय जे हरि के सुध करही। उही जनम-मरण के फेर ले उबरही। माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'