सार छंद

पूज्य गुरुदेव के दिए चित्र ऊपर रचना  के प्रयास 
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सार छंद 
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परसा के सुघ्घर फुलवा मन, हाँसत या रोवत हें। 
मनखे के स्वारथ के आघू, प्रकृति प्रेम सोवत हें। ।
अब विकास के भेड़चाल मा, पर्यावरण पिसागे। 
पेड़ काट के पौध लगाना, खानापूर्ती लागे। ।
बन संपदा लुटावँय दिनदिन,कटँय पेड़ मन सरलग। 
इँखर जघा मा कंकरीट के, जंगल लागँय जगमग। ।
खड़े चौंक चौराहा जइसे, महापुरुष के मूरत। 
बस शोभा बर लगयँ पेड़ झन, बदलै अइसन सूरत। ।
पेड़ लीम बर पीपर जम्मो, आमा अमली गस्ती। 
फिर से पावँय मया सबो खुँट, खेत खार घर बस्ती। ।
तब रुख राई के हर पाना, फर फुलवा इतराहीं।
अउ भुइँया के कोना कोना, मुसकाहीं ममहाहीं। ।
तब परसा के फुलवा देखत, सबके अंतस खिलहीं। 
अउ बसंत के असल मजा हा, हर मानस ला मिलहीं। ।🙏

दीपक निषाद 
छंद साधक-सत्र-10

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