चापलूस

चापलूसों की फौज खड़ी है,हर गाँव,हर शहर में।
सत्यवादी लोगों की कमी है,हर छाँव,हर डगर में।

मुँहफट आदमी की सीधी बात जहर लगती है।
दवाई की तरह कड़वी हो मगर असर करती है।
स्वाभिमान जिसमें जिंदा है,वही आज शर्मिंदा है।
कलयुग में अक्सर अच्छे लोगों की होती निंदा है।
निर्लज्ज को कोई फर्क नहीं पड़ता,हमारी नजर में।
चापलूसों की फौज खड़ी है,हर गाँव,हर शहर में।

शादीशुदा महिला और पुरुष आकर्षित हो रहे हैं।
पर पुरुष या महिला को देखकर समर्पित हो रहे हैं।
पति-पत्नि जानी दुश्मन,प्रेमिका,प्रेमी के लिए।
तलाक हो रहा है,हत्या,हवस की पूर्ति के लिए।
अब समर्पण कहाँ दिखता है पति-पत्नि हमसफर में?
चापलूसों की फौज खड़ी है,हर गाँव,हर शहर में।

जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

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