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गुरुजी बनके

का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। सरकार के गलती गाल म तमाचा सहीं लागे। अउ हाई कोर्ट के आदेश छाती म खंजर दागे। चेला से छुटगे गुरुजी के नाता क्षण भर म झट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? गुजरगे महीना कई बिन पद के तूता धरनास्थल म। डबल इंजन सरकार नइ करिन समायोजन अपन बल म। दुलरवा दरोगा ले डंडा के अंडा खवा दिन बिन कहे फट ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? दण्डाशरण पँइयाँ लागेंव बीच बजार म अउ का करँव? अपमान ल मान समझेंव बीच बजार म अउ का करँव? ज्ञान के दाता ल भिखमंगा बना डरिन भिखमंगा मन हुकूमत ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? आज नइते काली कोनो मोरो सुध लिही इही आस म। फेर चलत हवय सुंँवासा सरकारी मरघट के पास म। जीयत हँव गुरुजी के पद बर,अपन हक बर,अपन हठ ले। का गुनाह करेंव बिधाता,बीएड करके,गुरुजी बनके? ये देखके डीएड वाले मन के आँखी नंगत फरके। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

नकटा के नाक कटाय

नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जब चोरहा मनखे मन नियाव के सिंहासन म बिराजैं। करे निरपराधी के फैसला,जे मेहनत के पागा बाँधैं। चोरी करे सहीं,काकरो बहू-बेटी ल छेड़े सहीं, अपराधी बनाके गाँव-समाज ले छोड़े के हुकुम सुनाय। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। चोर के दाढ़ी म तिनका,ये कहावत सही जनाय। कोनो आन जात के बेटी ल खुदे उड़हरिया भगाय। अउ काकरो बेटी आन जात घर खुदे उड़हरिया जाय। नाक ल ऊँचा करके,सिधवा ल दंड के भागी बतायँ। नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। नकटा मन कुटेलहा परे अउ नाक सवा हाथ बाढ़े। बने मनखे के बीच बाजार,इज्जत के पैजामा उतारे। कोनो कंगला ल सता के ये मन फोकट म देवय राय। खुद के घर के गाथा ये मन ल काबर याद नइ आयँ? नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलाय। अमरित बचइया मन,नशेड़ी मन बर आरती सजायँ। सट्टा लिखइया-जुआ खेलइया मन बिक्कट बढ़ावा पाय। कोन उँकर हाथ बाँधैं हे,काबर आवाज नइ उठायँ। बिन पाती,बीच बजार ये मन ल काबर नइ बलायँ नकटा के नाक कटाय,उही मन सियानी चलायँ। देखव भइया,सुनव संगी घोर कलजुग आय। जीतेंद्र निषाद'चितेश'

माया के बजार

माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जिनगी भर करे'संगी'मोर मोर मोर, बात थोरिक गुन ले,इहाँ नहीं कोनो तोर। लोभ म मोहाके,अपजस धन कमाएस, जनसेवा बिसराके,हरि सेवा गँवाएस। पर ल पीरा देके तोर चोला कइसे तरही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। जवानी म बूड़े'संगी'सुवारथ मया म। जीयत भर नइ जानेस दया धरम करे ल। मन मंदिर म कभू दीया नइ जलाएस? हरिनाम के कंठ ले कभू जस नइ गाएस? हरि भजन बिन तोला मुक्ति कइसे मिलही? माया के बाजार ल,तज के जाना परही। गोविंद ल पाए बर गुरु के सुमरनी। करे ल परही सुधार अपन करनी। जिनगी के बेड़ा घलो पार लगही। अंत समय जे हरि के सुध करही। उही जनम-मरण के फेर ले उबरही। माया के बाजार ल,तज के जाना परही। नइ रोक सके कोनो जब काल हबरही। जीतेन्द्र निषाद'चितेश'

हरेली तिहार

हरेली तिहार फाँदै जांँगर बइला ला,खेत सही घानी मा। अन्न बरोबर तेल निकलै,झोंकै जग पेट थारी मा। श्रम के चीला चढ़ावै,देवता मान खेती के औजार ला। दास बरोबर किसनहा मन,जिनगी के हरेली तिहार मा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

माँ बमलई

माँ बमलई मोर मन के तरिया मा,खुशी के पानी लबालब होगे। मां बमलई के दर्शन झेलार मा,भरम कचरा दुरिहा सब होगे। बोलिन मोला बमलई मइया,सदा रइही मोर किरपा छइहाँ। सुख-दुख बिन जिनगी चलय नहीं,फेर नइ होवय दुख के खइहा। अँगना मा आशीष दे हे मइया,लाँघन रहिके कोनो सउँहत नरक नइ भोगे। मां बमलई के दर्शन झेलार मा,भरम कचरा दुरिहा सब होगे। राजाराम असन राजा अब नइ दिखय मइया,कोनो देश-राज मा। कलजुग के राजा खुदे होगे भरपेट बोजइया,अब के राजपाट मा। परजा संग राजा के जनसेवा धरम,सुवारथ दलदल मा,रबारब खोगे। मां बमलई के दर्शन झेलार मा,भरम कचरा दुरिहा सब होगे। घर के मुखिया लोग-लइका ला देवय सत,शील,ईमान के संस्कार  ज्ञान जोत ला अंतस तरी बार के,सदगुण जँवारा बोंवय हर दुआर। घरोघर लिही देवता-देवी अवतार,मनखे संस्कारवान जब होगे। मां बमलई के दर्शन झेलार मा,भरम कचरा दुरिहा सब होगे। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

सदगुरू मिलिस नाही

सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। नित हरि गुण गावय,काम करय रसिक राजा के। कलजुग के गुरु भक्ति बिन,सदगुरु बनय परजा के। पाँव परय असल चेला बिछल के गुरु दरबार मा। सदगुरु मिलिस  नाही,कलजुग के मायाबजार मा। चेला का करय,उहू भरम मा परय। गुरु के अलकर करनी नजरबंद रहय। कइसे होही बेड़ापार,जिनगी मझधार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। घर मा दाई-ददा अउ भाई-बहिनी, लइका-सियान के गजब कहिनी। देखय अउ सुनय बर मिलय,ये संसार मा। सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। संग मा रत्नावली सहीं,जब मिल जावय गुरु। तुलसीदास सहीं चेला,पावय पाठ-पीड़हा शुरु। तब गुरुमंत्र मा तरही मनखे,घर-दुआर,परिवार मा सदगुरु मिलिस नाही,कलजुग के मायाबजार मा। जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

होली हे

होली हे होली हे होली हे होली हे, होली हे होली हे होली हे। जिहाँ दया के चिन्हा अउ मया के बोली हे, होली हे होली हे होली हे..... कलजुग मा उराठिल मनखे के भाषा, पइसावाला बोलय पइसा के भाषा। गाँव-शहर मा नइ दिखय कान्हा के बासा, जिहाँ पियास बुझावय सुदामा सहीं पियासा। कलजुग मा कान्हा के, सुदामा कहाँ हमजोली हे। होली हे होली हे होली हे..... सुनता के सरु गाय घरोघर खोरी। नान्हें करय बड़का से मुँहजोरी। परिवार मा नइहे बेटा-बहू संस्कारी। निष्काम प्रेम के जे मारय पिचकारी। कलजुग मा सीता-राम सहीं, बहू-बेटा के कहाँ जोड़ी हे। होली हे होली हे होली हे..... बस कलजुग मा नइहे दधीचि,करण सहीं दानी। अब के महादानी दिखावा के चढ़य छानी। सोशल मीडिया मा फोटू भेजय आनी-बानी। अउ दान-धरम के रंग मा होली खेलय पानी-पानी। परमारथ के करमभूमि मा, नि:स्वारथ के कहाँ डोली हे। होली हे होली हे होली हे..... जीतेन्द्र निषाद'चितेश' सांगली,जिला-बालोद