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किसानी काम करता हूँ

किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। मेहनत की रोटी से अपनों का पेट भरता हूँ। खेती में कभी लाभ होता है, और कभी हानि होती है। कभी सिर पर कर्ज चढ़ जाता है, तो कभी जीने में परेशानी होती है। फिर भी अपने कर्म पथ पर अडिग रहता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। कीमत बढ़ गई,दवाई-खाद की, आमदनी घट गई,अवनि के औलाद की। मजे में है नेता-अभिनेता,व्यापारी और कर्मचारी, कौन सुनेगा?कौन देखेगा?किसान की लाचारी। अपने आप से ही,पागलों की तरह बात करता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। मौसम भी कड़ी परीक्षा लेता है,धरती के भगवान की, कैसे सोयी किस्मत जागेगी,मेहनतकश किसान की? सावन-भादों में कभी फसलें,बिन बारिश मर जाती है, और बैसाख-जेठ में बारिश,फसलों को डुबोकर जाती  है। ऐसी दशा में भी खुशी-खुशी,विधि के विधान को प्रणाम करता हूँ। किसानी काम करता हूँ,किसानी काम करता हूँ। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

जब जब राज्य में व्यापारी सरकार

जब जब राज्य में व्यापारी सरकार। मजदूर करें बस की सवारी हर बार। मालवाहक से ले जाने पर सरकार करें सख्ती। लोगों को बिठाकर काम में ले जाना बड़ी गलती। पुलिस के पकड़ में आ जाओगे कटेगा चालान। भारी भरकम राशि का करना पड़ेगा भुगतान। सभी द्वारपाल मजे से करें ये कारोबार। जब जब राज्य में व्यापारी सरकार। लोगों को बुलाकर चुनावी सभा में मुखिया करें मस्ती। मालवाहक से ले जाकर सदा सजाए सभा की बस्ती। नियम की अनदेखी कर,कानून को आँख दिखाकर। घमंड से सिर ऊँचा कर,चले जनता के नौकर चाकर। फिर वही काम जनता करें,बनाए अपराधी खूंखार। जब जब राज्य में व्यापारी सरकार। उस गाँव के किसान कैसे किसानी करें मुखिया। जहाँ ढूँढने से भी न मिलें एक मजदूर बुढ़िया। वहाँ मालवाहक से मजदूर ले जाकर होती थी किसानी। बस से होती है लागत में इजाफा,मुनाफा में हानि। जरा उस गाँव के किसान की भी सुनो पुकार। जब जब राज्य में व्यापारी सरकार। मजदूर करें बस की सवारी हर बार। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

केशकाल घाटी

चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी। सरग ल देखे बर एक घांँव,तेलीन दाई के मुंँहाटी। जल अमरित सही लागै जब बादर ह बरसे। तेलीन दाई के चरण पखारे बर जिनगी भर तरसे। धरती सही मटका म हमा जथे अमरित कस पानी। रुख-राई ल मिलथे,त सँवर जथे उँकर जिनगानी। लगथे मनभावन,कुदरत के यौवन आती-जाती। चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी। मोह-माया के भाँवर म जिनगी भर परे हे मनखे। तेलीन दाई के धाम बारा भाँवर के रद्दा म सँटके। देवत हावै दरसन आठो पहर,करलौ दरस जी भर के। तर जाही तोर चोला जनम-मरण के फेर ले उबर के। जस गा लौ,माथा टेक के कभू संझा कभू पहाती। चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी। पवन चलै धीरे-धीरे,मन ठुमकै धीरे-धीरे। कांँही के संसो नहीं,पहाड़ी के तीरे तीरे। दुख के खँइहा पटा जाही,संतोष के सुख म। आशीष मिलै तेलीन दाई के,घाटी के हर रुख म। दरस करे के बाद,बरस बरस जीये बर साथी। चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी। सरग ल देखे बर एक घांँव तेलीन दाई के मुंँहाटी। चलव रे भइया,चलव ओ दीदी,केशकाल घाटी। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

अपन भर जाय पेट

अपन भर जाय पेट दूसर के कोन करे चेत। यहा जमाना आ गे हे। सुवारथ पन छा गे हे। मंदहा मन सन जाबे तब। सादा भोजन नइ पाबे तब। मांसाहारी खावय मंदे-माँस। शाकाहारी देखय चुप्पेचाप। रतिहा के बेरा,होवय अबेरहा। घर जाये बर गाड़ी बिगड़हा। तीजा के बेरा सगा के घर। मंदहा पावय मजा अबड़। सादा मनखे लांँघन मरै। अँतड़ी वोकर नंगत जरै। पेटभर जेवन जेवय बर। घर म परम आनंद पाए बर। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

बिजली विभाग

बिजली विभाग की लापरवाही देखिए। करेंट से मृत,पशु को छोड़कर चल दिए। बिना दाह संस्कार किये'प्रिय मुखिया' जी। पशुपालक भी,हमें बनाकर चूतिया जी। हँसते-मुस्कुराते अपनी गली निकल लिए। करेंट से मृत,पशु को छोड़कर चल दिए। ग्राम सांगली,नयापारा रिहाइशी क्षेत्र में। ये देख कसक हो रही है हमारे हृदय नेत्र में। सामान्य लोग मूक दर्शक बनकर रह गए। करेंट से मृत,पशु को छोड़कर चल दिए। कुत्ते इकट्ठे हो रहे हैं,काग भी संग हो लिए। बस नोचने की तैयारी है,सूनापन भी चाहिए। सभी लोग समझदार बन,दाह संस्कार करिए। करेंट से मृत,पशु को छोड़कर चल दिए। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

मेरी प्यारी भांजी

मेरी प्यारी भांजी,अपने मामा के घर आइए। अपनी मधुर मुस्कान से मामी को लुभाइए। मामा तेरा कंजूस,मामी तेरी पिलाएगी जूस। यह जानकर मेरी भांजी,हो गयी बड़ी खुश। नाना तुम्हारा सब्जी बेच समोसा लानेवाला। रेणु भांजी के संग,चैतन्य,गावस्कर खानेवाला। नानी तुम्हारी चुलबुल मस्ती देख बुदबुदाती। मामी तुम्हारी अपनी बातों से शांत कराती। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"

नवा जमाना आ गे हे

नवा जमाना आ गे हे,नवा फैशन भा गे हे। कृष्ण के चोला पहिर पौंड्रक मन छा गे हे। नंगत के सम्हरावै अउ करै दिखावापन। कलयुग म मनखे मन लइका ल अपन। कोनो बनावै राधा,कोनो बनावै कृष्णा। फेर सीख नइ दे पाइन तजे बर तृष्णा। नकली चोला पहिर कइसे कृष्णा बन पाही?  जब मानवता के गुण लइका म नइ समाही। कृष्ण असन काम म पग पग देय ल परही परीक्षा। अउ जनहित बर प्राण देके करे ल परही समीक्षा। जीतेन्द्र निषाद"चितेश"