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भक्ति दोहा

राम राम के बेर मा,झन कर कउँआ काँव। जप ले जोही नाँव हरि,जिभिया ले हर घाँव।।

शराब

होगा किडनी-लीवर,एक दिन खराब जी। पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? हमें क्या है करना,ये तुम्हारी है मर्जी। यमराज के द्वार,स्वयं दे रहे हो अर्जी। बीवी-बच्चे भूखे,तुम बने हो नवाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? तुम हो बड़े ज्ञानी,बात किसकी मानी। दूध-दही-घी तुम्हें,लगे विष की रानी। दारू पीकर लगते हो,संत जनाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? तुम्हें मान सदा मिला,अपने समाज में। मस्त रहे तुम,अपने रीति-रिवाज में। जग से जाने के बाद,करना हिसाब जी? पीना है तो पियो,मुस्कुरा के शराब जी? जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद 

दोहा बोरे बासी

दोहा छंद बोरे बासी गोंदली,अउ खेड़ा के साग। कतको झन के भाग ले,काबर जाथे भाग।। मनखे मन समझैं नहीं,मनखे के जज्बात। एकर से जादा नहीं,जग मा दुख के बात।। कभू कभू देदे करव,लाँघन मन ला भात। अइसन पुन के काज ला,जानौ मनखे जात।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश'

सार छंद

पूज्य गुरुदेव के दिए चित्र ऊपर रचना  के प्रयास  ------------ सार छंद  ----------- परसा के सुघ्घर फुलवा मन, हाँसत या रोवत हें।  मनखे के स्वारथ के आघू, प्रकृति प्रेम सोवत हें। । अब विकास के भेड़चाल मा, पर्यावरण पिसागे।  पेड़ काट के पौध लगाना, खानापूर्ती लागे। । बन संपदा लुटावँय दिनदिन,कटँय पेड़ मन सरलग।  इँखर जघा मा कंकरीट के, जंगल लागँय जगमग। । खड़े चौंक चौराहा जइसे, महापुरुष के मूरत।  बस शोभा बर लगयँ पेड़ झन, बदलै अइसन सूरत। । पेड़ लीम बर पीपर जम्मो, आमा अमली गस्ती।  फिर से पावँय मया सबो खुँट, खेत खार घर बस्ती। । तब रुख राई के हर पाना, फर फुलवा इतराहीं। अउ भुइँया के कोना कोना, मुसकाहीं ममहाहीं। । तब परसा के फुलवा देखत, सबके अंतस खिलहीं।  अउ बसंत के असल मजा हा, हर मानस ला मिलहीं। ।🙏 दीपक निषाद  छंद साधक-सत्र-10

दोहा-झन खोवव ईमान

झन खोवव ईमान आज सुवारथ बर बनत,मनखे मन शैतान। भाई-भाई चीज बर,होवत लहूलुहान।। पर के बेटी ला घलो,अपने बेटी जान। फेर इहाँ शैतान मन,लूटत अपने मान।। करय मुनाफाखोर मन,अबड़ कमाई रोज। महँगाई बाढ़े बिकट,बजट बिगाड़े सोज।। रिश्वत बिन अब होय नइ,हर सरकारी काज। अधिकारी मन ला घलो,लागे नइ अब लाज।। चलव सम्हल के थोरकिन,झन खोवव ईमान। गोड़ लड़खड़ाही कहूँ,थेभा दिहि भगवान।। धरती मा भगवान हा,छोड़ सरग के धाम। खोजत आवय तोर घर,अइसन होवय काम।। जीतेन्द्र निषाद "चितेश"

किसानी गीत

बरस जा रे बादर बरस जा रे बादर,बरस जा रे बादर, बिन पानी के होवत हे,खेत हमर चातर। नइ हे कोनो किसनहा के,सुध लेवइया, सरकार पड़े हे पीछू,कुर्सी के भइया। बाँध के पानी कारखाना वाला बर, रोवत हे किसनहा मन माथा धर। तोर माथे रइथे,खेती के जाँगर, बरस जा रे बादर,बरस जा रे बादर। लागा बोड़ी होगे,कतको जोतई-फंदई मा, खेत-खार,बीज भात अउ निंदई-कोड़ई मा। मुरझावत हे धान-पान अउ दर्रा हाने खेत हे, आँसू चुचवावत किसनहा के चेत,बिचेत हे। बन जा किसनहा के खेत बर,तैं अमरित के सागर, बरस जा रे बादर,बरस जा रे बादर। जीतेन्द्र निषाद "चितेश" सांगली,गुरुर,जिला-बालोद

कुण्डलिया छंद-कहना मान

गहना बड़का जान लव,मीठ मया के बोल। मान रखै जे बोल के,मनखे उन अनमोल।। मनखे उन अनमोल,अपन करनी जे परखे, कथनी-करनी आन,रखै कलजुग के मनखे। कहना मान "चितेश",उचित हे जेकर कहना, कथनी-करनी कर्म,सोन ले बड़का गहना। जीतेन्द्र निषाद "चितेश"