Posts

दोहे खेत

खेत-खार तीरथ सही,हमर गाँव के शान। रोज करै दरसन हमर,हर बनिहार किसान।। अन्न खेत ले ऊबजै,पेट भरै संसार। असल पुजारी बन कृषक,पूजा करै अपार।।

जन्मदिन

आपका जन्मदिन-प्रतिदिन मंगलमय हो, जीवन के संघर्ष में दुख कतिपय न हो। सदा आशीष की वर्षा करे,आप पर रघुराई, नित्य अच्छे कर्मों से बढ़े आपकी सुघड़ाई। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂 💐💐💐💐💐🎂🎂🎂💐💐💐

रोटी पीठा-दोहा छंद

रोटी पीठा-दोहा छंद पपची बिड़िया ठेठरी,खुरमी कस पकवान। खाके कतको झन बनँय,शूरवीर बलवान।। जेन करी लाड़ू चखँय,उन ओकर गुण गाँय। भीम बरोबर बाहुबल,अपन भुजा मा पाँय।। रोग असन अरि मन डरँय,भागँय उन रण छोड़। रोग निरोधक शक्ति ले,देह रहँय बेजोड़।। मिलँय जिहाँ पकवान ए,हर घर सरग समान। जग मा अइसन धाम हें,छत्तीसगढ़ महान।। रोटी पीठा के असल,करत हवंँव गुणगान। तइहा निर्मल हर जिनिस,रिहिन शुद्ध पकवान।। खाए पीए के जिनिस,जहर बरोबर जान। जग मा नइ हें शुद्ध जी,अब कोनो सामान। मनखे मन के मन तरी,कस के लोभ हमाँय। मिलवट करके खल बनँय,पइसा फकत कमाँय।। पइसा हा सब कुछ नहीं,जग मा पुण्य कमाव। मानवता के पाठ ला,सीखव खुदे सिखाव।। जैविक खेती सब करँय,ए पद्धति हे सार। तभ्भे मिलही अन्न मन,शुद्ध कृषक बाजार।। रइही सेहत हा बने,शुद्ध अन्न सब खाँय। रोटी पीठा के असल,मजा रोज के आँय।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

सरसी छंद

सरसी छंद-गुरु सदगुरु बिन नइ मिलै ज्ञान हा,कइथें वेद पुरान। फेर कार कलजुग मा गुरु मन,बनत हवयँ शैतान। कोनो जग मा बापू बनके,कोनो भैयाराम। करत हवयँ गुरु सदगुरु बनके,फकत नाँव बदनाम। स्वार्थी गुरु संगत ले होही,कइसे बेड़ापार। चिटिको गुनव मोर हाँका ला,रोज्जे तीन जुवार। हमरो भीतर घलो समाहे,राग-द्वेष अभिमान। इंँकर संग मा रहिके गुरु के,कइसे करन बखान। मानवता के गुण मनखे मा,जे गुरु भरय अपार। वो गुरु ला बइहा चेला हा,खोजै बारंबार। आदिकाल के गुरुकुल गुरु मन,मन बइला ला फाँस। नेकी नंगत करय जगत मा,जस बगरै आकास। कलजुग के खपचलहा गुरु मन,इंद्रिय कसैं लगाम। तभ्भे अमर रही जग मा गुरु,अउ सदगुरु के  नाम। बने करम ले जीव-जगत के,करही गुरु उद्धार। गुरु के महिमा मनखे गावत,करही जय-जयकार। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दोहा-रक्तदान

दोहे  रक्तदान के काम मा,सरलग कर सहयोग। अपन लहू ला दान कर,परमारथ सुख भोग।। रक्तदान के अहमियत,एक सिखावै पाठ। पर के जिनगी नित बचा,झन कर हिरदै काठ।। जगही जब संवेदना,पर के दुख ला देख। मानवता तभ्भे रही,मनखे तरी सरेख।। मानवता के गुण बिना,रक्तदान नइ होय। कतको मनखे प्राण ला,बिपत परे मा खोय।। धर सकथे विपदा कभू,दुर्घटना कस रूप। प्रसवकाल के संग मा,रक्तस्त्राव कस कूप।। हीमोफिलिया संग मा,ल्यूकिमिया के रोग। अइसन रोगी ला लगै,सदा लहू के भोग।। सदा जरूरतमंद बर,अपन लहू ला देव। इसन रक्तदाता सदा,अघुवा रह स्वयमेव।। जीयत भर देके लहू,अपन कमा ले साख। फेर मरे के बाद तैं,होबे संगी राख।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

बरवै छंद-चिरहा चीर

बरवै छंद-चिरहा चीर हमर गाँव के तरिया,रद्दा तीर। मैं देखेंव एक झन,खड़े फकीर। ओकर तन मा आरुग,चिरहा चीर। ओला देख मोर मन,होय अधीर। जग मा कइसे जीयत,हे इंसान। मनखे कोती दे प्रभु ,चिटिक धियान। मोर स्वप्न मा कइथे,हरि भगवान। तैंहा लइका जइसे,निचट नदान। हरे पश्चिमी फैशन,ए परिधान। मोला दोष अतिक झन,दे इंसान। अतिक समझ नइ पाइस,तोर जमीर। लगै असल बड़हर हा,असल फकीर। पहिरत हावय कपड़ा,बाँध जँजीर। टूरा मेछराय बस,टूरी तीर। चिरहा चीर पहिर के,मारय टेस। नव फैशन नइ जानस,टार 'चितेश'। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद

दोहा जपले जोही

सादर समीक्षा हेतु दोहा छंद-जप जोही हरि नाँव ला राम राम के बेर मा,झन कर कउँआ काँव। जप जोही हरि नाँव ला,जिभिया ले हर घाँव।। कल्लर कइयाँ ले कभू,मिलै नहीं सुख-चैन। अंतस मा होथे दरद,दिन लागै ना रैन।। गोठ सियानी प्रेम के,मूर्ख समझ नइ पाय। कीलिर कालर होय ले,घर हा नरक जनाय।। सहनशीलता अउ सुमति,दू ठन हवय उपाय। जेकर ले परिवार मा,सुख सम्मत नित छाय।। जीतेन्द्र निषाद 'चितेश' सांगली,जिला-बालोद